क्या तुमने खोजी संजीवनी बूटी, अरे मत फैलाओ खबरें झूठी

क्या तुमने खोजी संजीवनी बूटी, अरे मत फैलाओ खबरें झूठी  

पंकज अवधिया

क्या बात है मित्र तुमने संजीवनी बूटी खोज निकाली है वो भी हेलीकाप्टर से हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में अपने चेले के साथ जाकर. निश्चित ही मैं अभिभूत हूँ.

मेरा वनवासी मित्र यहाँ हिमालय से कोसो दूर मुझे एक वनस्पति दिखाता है और कहता है कि यह बठेला चारा है. बठेला यानी जंगली खरगोश. जंगली खरगोश का प्रिय भोजन है इसलिए मांस के लिए इसका शिकार करने वाले इसे बखूबी जानते हैं.

ऋषिपंचमी के दिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से महज कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर रहने वाले वनवासी जंगलों का रुख करते हैं अल सुबह ही. उन्हें बताया गया है कि इस दिन सभी वनस्पतियाँ औषधीय गुणों से सम्पन्न हो जाती है और वर्ष में आज के दिन इसका सेवन वर्ष भर समस्त रोगों से रक्षा करता है. यही कारण है कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक जंगल में चले जाते हैं और कंद-मूल उखाड़ लाते हैं. इन्हें  उबाला जाता है और फिर दिन भर खाया और खिलाया जाता है.

पिछले वर्ष  ऋषिपंचमी के दिन जडी-बूटियों से भरी बांस की टोकरी उठाये एक वनवासी से मैं पूछ ही लेता हूँ कि क्या इसमें संजीवनी बूटी है ?  उसकी आँखों में चमक आ जाती है और वह जड़ी-बूटियों के ढेर से एक बूटी निकालता है और कहता है कि यह लक्ष्मण बूटी है. इसे ही हनुमान जी लेकर आये थे लक्ष्मण जी की जान बचाने.

तुम्हे आश्चर्य होगा मित्र कि यह वही बूटी है जिसे तुम दुर्लभ बताकर हेलीकाप्टर पर चढ़कर लाये थे और फिर “पेड न्यूज” के जरिये तुमने दुनिया भर के अखबारों के माध्यम से यह जताने की कोशिश कि तुमने अप्रतिम खोज कर ली है.

पीढीयों से इस संजीवनी बूटी के साथ जंगल में रह रहे वनवासी तक शायद अखबारों की यह खबर नही पहुँची है और यदि पहुँची भी होगी तो इन्हें इससे क्या मतलब.

पांच वर्ष पूर्व रायगढ़ के आस-पास की पहाड़ियों में मुझे यह बूटी फिर दिखी. पर उसका रंगा गहरा काला था. पहाड़ के ऊपर सपाट भाग में ऐसा लगता था जैसे किसी ने संजीवनी बूटी की काली चादर बिछा दी हो.
मित्र, मेरा वैज्ञानिक मन सोचने लगा कि मैंने भी कोई नई खोज कर ली है. काले रंग की संजीवनी बूटी की. पर साथ चल रहे वनवासी ने बताया कि यह रायगढ़ के आस-पास के कारखानों से निकलने वाली काली धूल के कारण काला पड़ गया है. अब ये वनवासी चाहकर भी इस संजीवनी बूटी का प्रयोग वर्ष भर स्वास्थ रक्षा के लिए नही कर पाते हैं. उन्हें सरकारी अस्पताल की शरण लेनी पडती है जहां जीवन की कीमत नही के बराबर रह जाती है.

मित्र, तुमने अखबारों में छपकर ही संजीवनी बूटी से संतुष्टि पा ली पर पीढीयों से मेरे देश के पारम्परिक चिकित्सक इस संजीवनी बूटी से असंख्य कैंसर रोगियों की जान बचा रहे हैं. 

इसलिए कहता हूँ कि मित्र एक बार अवश्य पधारों इन भूमिपुत्रों के पास जो बाजार की चकाचौंध से कोसो दूर हैं और जिनले पास भारत का विशुद्ध पारम्परिक ज्ञान अपने मूल रूप में सुरक्षित है.  आओगे ना.    


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