शहद की बढ़ती जंग, सस्ती या महंगी किसी में नही असली रंग

शहद की बढ़ती जंग, सस्ती या महंगी किसी में नही असली रंग

पंकज अवधिया

फिर चले गये बाजार! मैंने मना किया था न कि बाजार से बचो. और ये क्या ले आये मख्खी का जूठा. हां, तुम मुझे गलत कह सकते हो. मख्खी नही मधुमख्खी. चलो सुधार कर लिया.

तो आप मदरस यानी शहद लेकर आये हैं बाजार से. वो भी इतनी सस्ती. हमने तो यही सुना है कि सस्ती रोये बार-बार महंगी रोये एक बार. खैर, छोडिये शायद यह शहद पर फिट न हो.

मित्र, पहले कितनी आसानी थी घर के सामने ही शहद बेचने वाला मिल जाया करता था. आप उस पर विश्वास करते थे और वो आप पर और इस तरह हम कितनी सारी शहद गटक जाया करते थे बिना शुद्धता की जांच किये.

ऐसा नही है कि हमे शुद्धता के बारे में जानकारी नही थी. पांच सौ का नोट शहद में डुबाकर जलाने से वो नही जलता. हमने कई बार आजमाया पर एक बार नोट जल गया. हम खूब लड़े शहद वाले से पर बाद में पता चला कि पांच सौ का नोट ही नकली था.

तो मित्र बाजार में सस्ती और महंगी शहद बेचने वाले इस तरह के प्राचीन और टाइम टेस्टेड परीक्षणों  की बात करते हैं क्या? शायद नही करते होंगे.

अब देखों कल ही किसी ने बताया कि कुत्ता शहद नही खाता है. तो जब एक दुकान वाले के सामने हमने शहद को कुत्ते को चटाया तो सपड-सपड करके वो पूरी शहद चाट गया. तिस पर दुकान वाला बोला कि साहब शहद तो असली है पर लगता है कुत्ता नकली है.

मित्र, मुझे मालूम है कि तुम्हे देश से कितना प्रेम है. इसलिए तुम देश की कम्पनी की शहद ही खरीदोगे. विदेश की कम्पनी और उनके खाद्य उत्पाद बेकार है. लगे रहो मित्र पर मैं तुम्हारे लिए चिंतित हूँ. सुना है अब दालें मोजाम्बिक में उगेंगी और मोजाम्बिक भारत में नही है यानी विदेश है फिर तुम कैसे इस दाल को पचा पाओगे.  तुम्हारे स्वदेश प्रेम का क्या होगा. मैं सचमुच बड़ा ही चिंतित हूँ.

छत्तीसगढ़ के जंगलों में आदिवासियों के पास मिलने वाली शहद कभी एक स्वाद की नही होती. जब मैं पूछता हूँ कि यह तो कडवी है तो शहद लाने वाला वनवासी बड़े ही भोलेपन से कहता है कि अभी कर्रा फूला हुआ है इसलिए यह कडवी है.

फिर अगली बार वह कहता है कि इस शहद से आप वर्ष भर रोगों से बचें रहेंगे क्योकि यह नीम के वृक्ष से एकत्र की गयी शहद है. ऐसे साल भर केवल शहद का सेवन बहुत सारा चिकित्सा व्यय बचाता रहता है.
तुम्हे तो याद ही होगा मित्र कि पिछले वर्ष तुम्हारे कैंसर पीडित भांजे के लिए इस वनवासी ने घने जंगल से संजीवनी शहद लाकर दी थी जिससे उसकी स्थिति में जल्दी से सुधार हुआ. 

क्या बाजार में “सस्ता-सस्ता” कहकर शहद बेचने वाले मेरी शहद तेरी शहद से सस्ती के आलावा भी कुछ बात करते हैं. शायद नही करते होंगे मित्र क्योंकि उनकी शहद गन्ने के अवशेषों से मीठी होती है न कि जंगल की वनस्पतियों के सत्व से.

मित्र, लगता है कि बस्तर का मेरा वनवासी शहद वाला अब शायद ही फिर मदरस लेकर आये. वो मधुमख्खी के छत्तों में बढ़ रहे छेदों से परेशान है. पिछले कई दशको  में वहां चारो ओर से इतनी सारी गोलियां चली है कि मधुमख्खी के छत्तों में अनगिनत छेद हो गये हैं और सारा मदरस धरती में समा रहा है.
  

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