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Monday, August 11, 2014

छातिम (Alstonia) से होने वाली एलर्जी से बचने पारम्परिक नुस्खे: पंकज अवधिया का डेटाबेस - 5



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छातिम से होने वाली एलर्जी से बचने पारम्परिक नुस्खे: पंकज अवधिया का डेटाबेस - 4



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छातिम से होने वाली एलर्जी से बचने पारम्परिक नुस्खे: पंकज अवधिया का डेटाबेस - 3



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छातिम से होने वाली एलर्जी से बचने पारम्परिक नुस्खे: पंकज अवधिया का डेटाबेस - 2



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छातिम से होने वाली एलर्जी से बचने पारम्परिक नुस्खे: पंकज अवधिया का डेटाबेस - 1



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Saturday, August 2, 2014

अस्थमा के लिए उत्तरदायी सजावटी वृक्ष से क्या नई राजधानी बची रह सकेगी?

अस्थमा  के लिए उत्तरदायी सजावटी वृक्ष से क्या नई राजधानी बची रह सकेगी?
                                       -पंकज अवधिया 
 

वर्ष १९९२ में जब आई.आई.टी. कानपुर परिसर में अचानक ही बड़ी संख्या में लोग अस्थमा (दमा) के शिकार होने लगे तो इसके कारण की खोज की जाने लगी| पता चला कि हाल ही में फूलों से लदे दस से अधिक सप्तपर्णी  के वृक्षों को काटा गया था| इस प्रक्रिया में उनके परागकण हवा में बिखर गए और आस-पास रहने वालों को अस्थायी अस्थमा हो गया| सप्तपर्णी से एलर्जी न केवल आम लोगों के लिए बल्कि विशेषज्ञों के लिए भी नयी बात थी| उस समय विज्ञान इसके बारे में ज्यादा कुछ कहता नहीं था| आई.आई.टी. कानपुर परिसर में सप्तपर्णी के हजारों वृक्ष हैं| आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि छत्तीसगढ़ विशेषकर रायपुर में इसके अनगिनत वृक्ष मौजूद हैं| इन्हें सजावटी वृक्षों की तरह सडक के दोनों ओर बड़ी संख्या में लगाया गया है और लगातार लगाया जा रहा है| वर्ष १९९२  के बाद इस पर व्यापक शोध हुए और अब यह स्थापित हो चुका है कि इसके परागकण अस्थमा और सम्बन्धित रोगों के लिए उत्तरदायी हैं| 

मनुष्यों की तरह ही वनस्पतियों में अच्छाईयां और बुराईयाँ दोनों होती हैं| सप्तपर्णी या छातिम का वैज्ञानिक नाम ऐलेस्टोनिया स्कालेरिस है| यह महाकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर का पसंदीदा वृक्ष रहा है| शान्ति निकेतन में बड़ी संख्या में इसे लगाया गया है| इसे दीता के नाम से पहचाना जाता है बंगाल में| यह वहां का राजकीय वृक्ष है| आज भी शान्ति निकेतन में डिग्री सप्तपर्णी की पत्तियों में दी जाती है दीक्षांत समारोह में| वैज्ञानिक सन्दर्भ कहते हैं कि शायद इसीलिये सप्तपर्णी का नाम स्कालर ट्री पड़ा| पहले स्लेट पट्टी का निर्माण इसकी लकड़ियों से होता था| इसे ब्लैक बोर्ड ट्री भी कहा जाता है| 

शहरों में योजनाकार इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि इसे कम देखभाल के लगाया जा सकता है| इसके फूल सुंदर होते हैं पर इनकी गंध अजीब सी होती हैं| इस गंध को किसी भी दृष्टिकोण से सुगंध नहीं कहा जा सकता है| देश भर में अक्टूबर से मार्च के बीच इसमें पुष्पन होता है| इसी समय अचानक ही आस-पास अस्थमा के रोगियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है| आम लोग यह नहीं समझ पाते हैं कि उनके इस महारोग का  कारण घर में सामने उग रहा यह सजावटी वृक्ष है| वैसे ही राजधानी के लोग गाजर घास के परागकणों से होने वाली एलर्जी से साल भर त्रस्त रहते हैं| ऐसे में सप्तपर्णी की यह मार सोने में सुहागा वाली बात होती है| 

भले ही सप्तपर्णी के परागकण हानिकारक है पर इसके दूसरे भाग औषधीय गुणों से भरपूर हैं| बंगाल में तो दीपावली जैसे उत्सवों से पहले इसकी छाल का काढ़ा पीने की परम्परा है ताकि उत्सवों के दौरान मीठे व्यंजनों के हानिकारक प्रभावों से बचा जा सके| देश भर के पारम्परिक चिकित्सक मधुमेह की चिकित्सा में इसका प्रयोग करते हैं पर जरा सम्भलकर क्योंकि इसकी अधिक मात्रा किडनी और मूत्र तंत्र को नुक्सान पहुंचाती है| देश के पारम्परिक चिकित्सक सप्तपर्णी के साथ दस से लेकर ३०० प्रकार की वनस्पतियाँ मिलाकर इसका प्रयोग करते हैं ताकि सप्तपर्णी के दोषों को दूर कर केवल लाभ लिया जा सके| आधुनिक वैज्ञानिक साहित्य बताते हैं कि दुनिया भर में साधारण ज्वर से लेकर कैंसर जैसे जटिल रोगों की चिकित्सा में सप्तपर्णी का प्रयोग होता है| 

पारम्परिक खेती विशेषकर जैविक खेती से जुड़े किसानो के लिए यह वरदान है| इसके विषय में समृद्ध पारम्परिक ज्ञान हमारे देश में है| आज भी इसका प्रयोग सफल है और बहुत से मामलों में तो आधुनिक कृषि रसायनों के असफल हो जाने के बाद भी यह सफलतापूर्वक किसानो को समस्या से निजात दिला देता है| 

सप्तपर्णी का एक अंग्रेज़ी नाम "डेविल ट्री" है| शायद इसके हानिकारक गुणों को देखते हुए इसे यह नाम मिला है| पश्चिमी घाट के आदिवासी पीढीयों से यह मानते आये हैं कि इसमें शैतान का वास होता है| इसलिए वे इससे दूरी बनाये रखते हैं और गांव में इसे नही लगाते| अक्सर जन-स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वृक्षों से ऐसी बातें जोड़ दी जाती हैं ताकि आम लोग उसमें रूचि न लें|     

आधुनिक विज्ञान हमें इसके सभी पहलुओं के विषय में जानकारी देता है| यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि कैसे हम इसका उपयोग करते हैं| ऐसे स्थान जो मानव आबादी से दूर हों वहां पर निश्चित ही इसका रोपण लाभप्रद होगा| नयी राजधानी में बड़े पैमाने पर इसे लगाने की योजना है| सम्भवत: योजनाकार इसके हानिकारक प्रभावों के परिचित नहीं है| अखबार के माध्यम से वे आज यह जान चुके हैं|  उन्हें पुनर्विचार करना चाहिए| 

राजधानी के चौबे कालोनी में बड़ी संख्या में सप्तपर्णी उपस्थित है| बहुत से जानकार पुष्पन के समय वृक्ष पर नमक के तनु घोल का छिडकाव कर देते हैं ताकि परागकणों की सक्रियता कम हो जाए और उनसे नुक्सान न हो| पर बड़े पैमाने और बड़े वृक्षों पर ऐसे प्रयोग संभव नहीं हैं|  कुछ दिनों पहले सिरपुर मेला की ओर जाते हुए मैंने रास्ते में जंगल में सडक के दोनों ओर लगाये गए सप्तपर्णी को देखा| प्राकृतिक तौर पर ये हमारे जंगलों में नहीं है| रास्ते भर सोचता रहा कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ये वन्य जीवों को जाने क्या नुक्सान पहुंचा रहे हों?    

(लेखक कृषि वैज्ञानिक हैं और राज्य में पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं|)     

Published in Navabharat, Daily Chhattisgarh and Covered by Sahara Chhattisgarh.

Sunday, July 13, 2014

500 घंटों की फिल्मों में समायी बस्तर की जैव-विविधता

500 घंटों की फिल्मों में समायी बस्तर की जैव-विविधता 

- बस्तर पर १ टीबी की सामग्री इंटरनेट पर 
- विश्व मानचित्र में बस्तर की नई पहचान 

जैव-विविधता संपन्न बस्तर की औषधीय वनस्पतियों से संबंधित पारम्परिक ज्ञान अब इंटरनेट पर ५००  से अधिक घंटों की  फिल्मों के  रूप में उपलब्ध है। इन फिल्मों में बस्तर में पीढ़ीयों से पारम्परिक चिकित्सा में उपयोग किये जा रहे सात लाख से अधिक औषधीय नुस्खों और मिश्रणों का ज्ञान समाहित है। 

वर्ष १९९० से राज्य में पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहे जैव-विविधता विशेषज्ञ पंकज अवधिया ने छत्तीसगढ़ को बताया कि आर्काइव डाट ऑर्ग, यू ट्यूब और फ्लिकर जैसी वेबसाईटों के माध्यम से १००० जीबी (१ टीबी) से अधिक की अकादमिक सामग्री को विश्व समुदाय के सामने प्रस्तुत किया है. इन फिल्मों से संबंधित अतिरिक्त जानकारी "एन्साइक्लोपीडिया ऑफ ट्राइबल मेडीसीन्स"  नामक ग्रन्थ के माध्यम इंटरनेट पर  उपलब्ध है. पूरी दुनिया बस्तर के विषय में विस्तार से जानने को उत्सुक है। प्रतिदिन १०० जीबी से अधिक की बस्तर से संबंधित सामग्री इन वेबसाइटों से दुनिया भर में डाउनलोड की जाती है. इंटरनेट पर "बस्तर की जड़ी-बूटियाँ". "जलवायु परिवर्तन से प्रभावित बस्तर की जड़ी -बूटियाँ". "बस्तर की दुर्लभ औषधीय वनस्पतियाँ", "बस्तर का पारम्परिक आदिवासी ज्ञान", "बस्तर के आदिवासी और उनकी संजीवनी बूटियाँ" आदि विषयों को गूगल पर सर्च करके इन लघु और दीर्घ अवधि की फिल्मो तक पहुँचा जा सकता है. "बस्तर की जड़ी-बूटियाँ अम्ल रोगों के लिए" (अवधि: ५२ मिनट), "बस्तर की जड़ी-बूटियाँ नपुंसकता के लिए" (अवधि: ३५ मिनट), "बस्तर की जड़ी-बूटियाँ मधुमेह के लिए" (अवधि: ४० मिनट), "बस्तर की जड़ी-बूटियाँ यकृत रोगों के लिए" (अवधि: ५९ मिनट), "बस्तर की जड़ी-बूटियाँ बवासिर के लिए" (अवधि: ६३ मिनट) आदि लोकप्रिय हिन्दी फिल्मो में है जबकि अंग्रेजी फिल्मो में मेडिसिनल राइस फार्मूलेशन्स ऑफ बस्तर नामक श्रृंखला पसंद की जाती है. "बस्तर के जाने-माने बैदराज और उनकी चमत्कारी बूटियाँ", "बस्तर की सामरिक महत्व की जड़ी-बूटियाँ", "बस्तर में सावन  माह में एकत्र की  जाने वाली जड़ी-बूटियाँ", "बस्तर के बैगा और उनकी जड़ी-बूटियाँ", "बस्तर का औषधि पुराण", "बस्तरिया कंद -मूल से जटिल रोगों की चिकित्सा" आदि फिल्मों से संबंधित शोध दस्तावेज भी उपलब्ध हैं,  इन फिल्मो में पारम्परिक फसलों, जड़ी-बूटियों, जंगली मशरूम, नाना प्रकार के आर्किड्स आदि पर आधारित पारम्परिक नुस्खों को रोगों के आधार पर बाँट कर प्रस्तुत किया गया है. बस्तर के आदिवासियों के बीच लोकप्रिय लाल चीटी चापरा से लेकर बांस कीड़ा और रानी कीड़ा तक असंख्य पारम्परिक नुस्खों में प्रयोग किये जाने वाले कीड़े-मकोड़ों के बारे में "ट्रेडीशनल एंटोमोफैगी एंड एंटोमोथेरेपी इन बस्तर" नामक श्रृंखला तैयार की गई है. इनमे औषधीय धान पर भी विशेष सामग्रियाँ हैं. इन फिल्मो को  पिछले २४ वर्षों में ३५०००  पारम्परिक चिकित्सकों से हुयी बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है.इनमे से बहुत से पारम्परिक चिकित्सक अब हमारे बीच नही हैं. नीम, गिलोय, एलो, तेलिया कंद, ऐरी कांदा, पनीर फूल, ब्राम्ही, सफेद मूसली जैसी सैकड़ों जड़ी-बूटियों के अधिक सेवन या विषाक्तता से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के निवारण के लिए पारम्परिक चिकित्सक जिन औषधीय मिश्रणों का प्रयोग करते हैं उन्हें भी फिल्मो के माध्यम से दर्शाया गया है. इन फिल्मों के अलावा छत्तीसगढ़ की औषधीय वनस्पतियों पर आधारित १५  लाख तस्वीरों को डिस्कवरलाइफ नामक वेबसाइट के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है. 

इंटरनेट की कम गति के कारण अपलोड का कार्य बहुत धीमा है. एक फिल्म अपलोड करने में आठ से दस घंटों का समय लग जाता है. पंकज अवधिया का मानना है कि छत्तीसगढ़ का अपना वेब पोर्टल होना चाहिए जिसमे इन अकादमिक महत्व की सामाग्रियों को रखा जाना चाहिए। इससे राज्य  में औषधीय वनस्पतियों पर शोध कर रहे युवा वैज्ञानिकों को प्रेरणा मिल सकेगी और दुनिया भर के लोग छत्तीसगढ़ की अनोखी  जैव-विविधता के विषय में जान सकेंगे।     

पंकज अवधिया बस्तर के अलावा अमरकंटक और उड़ीसा के गंधमर्दन पर्वत की जैव-विविधता पर भी ऐसी फिल्मे बना रहे हैं और उन्हें इंटरनेट के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं.