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जल शुद्धिकरण का पारम्परिक ज्ञान नदियों को कर सकता है प्रदूषणमुक्त

जल शुद्धिकरण का पारम्परिक ज्ञान नदियों को कर सकता है प्रदूषणमुक्त -पंकज अवधिया चाहे गंगा हो या महानदी प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में मेले के रूप में आम लोगों का बड़ी संख्या में जमावड़ा नदियों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है| पूजन सामग्री से लेकर गुटखों के पाउच-सब कुछ नदी में बहता है और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है| बेहतर तो यही होता कि सालाना मेलों की बजाय दस से बारह वर्षों में एक बार मेला लगता ताकि बीच के लम्बे समय में नदियों को सम्भलने का कुछ मौक़ा मिल सकता| पर यह सम्भव नहीं दिखता| ऐसे में छत्तीसगढ़ में जल से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान अहम भूमिका निभा सकता है| राज्य में अब तक २५० से अधिक ऐसी वनस्पतियों की पहचान हो चुकी है जो प्रदूषित जल को साफ़ करने का माद्दा रखती हैं| इन वनस्पतियों के आधार पर हजारों ऐसे मिश्रण बनाये जा सकते हैं जिनके प्रयोग से मेलों के दौरान नदियों के प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है| यह विडम्बना ही है कि सबसे पहले छत्तीसगढ़ से ही मुनगा और निर्मली के बारे में जानकारी पूरी दु...