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तैयारी शरद पूर्णिमा की श्वांस रोगियों के लिए उपयोगी जड़ी-बूटियों के साथ

पंकज अवधिया की जंगल डायरी ( अक्टूबर, २०११ से आगे) भाग-१ तैयारी शरद पूर्णिमा की श्वांस रोगियों के लिए उपयोगी जड़ी-बूटियों के साथ - पंकज अवधिया शरद पूर्णिमा आने वाली है| सालों से उन पारम्परिक चिकित्सकों के अथक परिश्रम और निस्वार्थ सेवाओं को देख रहा हूँ जो हर साल बेसब्री से इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं और फिर शरद पूर्णिमा की रात जब हजारों की संख्या में श्वांस रोग से प्रभावित आम लोग एकत्र हो जाते हैं तो रात भर जागकर बिना थके उन्हें अपने हाथों से बनाई विशेष खीर खिलाते रहते हैं| इसके लिए कोई पैसे नही लिए जाते हैं| दूध से लेकर शक्कर और सबसे महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों सभी का खर्च स्वयम वहन करते हैं| "ये तो जस का काम है|" वे कहते हैं| उन्हें असंख्य लोगो की दुआएं मिलती है| इससे बढ़कर और क्या हो सकता है भला| क्या एक बार एक चम्मच या उससे कुछ अधिक मात्रा में खीर का सेवन मौसम भर श्वांस रोगों से मुक्त रख सकता है? यह अहम् प्रश्न है विशेषकर आधुनिक युग के सन्दर्भ में क्योंकि आज का मानव दूषित वातावरण में रहने को मज...

क्या जल्दी कर दी हमने आने में?

क्या जल्दी कर दी हमने आने में? - पंकज अवधिया " क्षमा करे पर शेयर्ड होस्टिंग श्रेणी में हम आपकी वेबसाईट नहीं रख सकते| आपको वर्चुअल पर्सनल सर्वर श्रेणी में जाना होगा| इसके आपको बीस हजार रूपये लगेंगे सालाना|" हम (माने मैं और मेरा वेबमास्टर) अपनी वेबसाईट में ३० जीबी की सामग्री की अपलोडिंग समाप्त करने ही वाले थे कि यह सूचना आई| हम तैयार हो गए ५००० सालाना से बीस हजार सालाना की स्कीम के लिए| जब हम ३५ जीबी पर पहुंचे तो सूचना आई कि आप डेडीकेटेड सर्वर श्रेणी में जाए जिसका किराया लगभग ४८,००० रूपये हैं आधे साल का | यदि आप तैयार नहीं है तो हम आपकी साईट को होस्ट नहीं कर सकते| हमारे होश उड़ गए| वेबसाईट में दो ऐसे हिस्से थे जो ट्रेफिक का भार नहीं सहन कर पा रहे थे| एक हिस्सा जिसमे ६५०० से ज्यादा पीडीएफ फ़ाइल थी और एक फ़ाइल की साइज ३ से ४ एमबी थी| और दूसरा हिस्सा फोटो गैलरी का जिसमे दस लाख से अधिक फोटोलिंक्स थे| आखिर हमने फैसला किया कि हम इन दोनों को वेबसाईट से हटा लेंगे और चार जीबी की सामग्री ही वेबसाईट में रहने देंगे| छत्तीसगढ़ के जंगलों की ख़ाक छानते हुए औ...

मरणासन्न रोगी और बाहरी तौर पर प्रयोग की जाने वाली वनस्पतियों की सफलता

पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के साथ मेरी जीवन यात्रा-१ - पंकज अवधिया मरणासन्न रोगी और बाहरी तौर पर प्रयोग की जाने वाली वनस्पतियों की सफलता रात में देर से सोने के कारण सुबह जल्दी उठने की योजना नहीं थी| लगभग नब्बे हजार चित्रों और लाखों फोटोलिंक्स वाली मेरी वेब गैलरी में कुछ तकनीकी समस्या हो गयी और उसे आफ-लाइन करना पडा| मुझे बताया गया कि फिर से आन-लाइन करने में कुछ वक्त लग सकता है| मन में खिन्नता थी पर यह अच्छा हुआ कि नींद आ गयी बिना परेशानी के| सपने में जंगल की ख़ाक छान रहा था कि तेज आवाज ने मेरी आंखे खोल दी| पता चला कि किसी मरणासन्न रोगी के घरवाले काफी समय से मेरे उठने की प्रतीक्षा कर रहे हैं| मै उठा और वैसे ही उनके सामने हाजिर हो गया| रोगी हिलने-डुलने की स्थिति में नहीं है इसलिए मुझे चलना होगा| मैंने अपना रटारटाया संवाद दोहरा दिया कि मैं चिकित्सक नहीं हूँ| पर वे मानने को तैयार नहीं थे| "कम से कम एक बार देख तो लीजिये|" उनका अनुरोध टाला नहीं जा सका और आधे घंटे बाद मैं रोगी के सामने खड़ा था| ६५ वर्षीय महिला की हाल...