Saturday, October 6, 2007

काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे : भाग –दो

काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे : भाग दो

- पंकज अवधिया

रोज अखबारो और पत्र-पत्रिकाओ मे जो हम देशी नुस्खे पढते है वे भी हमारी पारम्परिक विरासत की ही देन है पर इनमे आप कभी भी नुस्खे किनसे एकत्रित किये गये है? यह जानकारी नही पायेंगे। यह भी एक तरह का दस्तावेजीकरण है पर इसमे इस ज्ञान को सभी भारतीयो का ज्ञान मान लिया जाता है। जो सही भी है और नही भी। स्वास्थ्य पत्रिकाए तो और हद करती है। सक्षम लेखक आस-पास उपलब्ध पारम्परिक ज्ञान को अपने नाम पर प्रकाशित कर लेते है फिर लेखक और प्रकाशक उस पर अपना हक जताने लग जाते है। बात यही नही रूकती। इस ज्ञान के प्रयोग से वे आर्थि अर्जन भी करते है। मैने अपने लेखो मे लिखा है कि कैसे मध्य भारत के एक चिकित्सक एक पारम्परिक चिकित्सक से सिकल सेल एनीमिया के कारगर इलाज का नुस्खा लिया और फिर केप्सूल मे उसे डालकर ऊँची कीमत पर अपने रोगियो को दे रहा है। यह तो खुलेआम शोषण हुआ। ज्यादातर मामलो मे तो पारम्परिक चिकित्सको को सच का पता नही चलता। जब मै बहुत से पारम्परिक चिकित्सको से मिलता हूँ तो पता चलता है कि उनसे पहले ही से बहुत से विदेशी शोधकर्ता मिल चुके है। जैसे मै सरायपाली के भूतिया गाँव के पारम्परिक चिकित्सको से मिला जो कि पीलिया सहित कई रकार के रोगो की चिकित्सा मे माहिर है। पास के पर्वतो से वे वनौषधीयो का एकत्रण करते है और फिर दवा बनाते है। उन्होने बताया कि एक विदेशी डाक्टर ने उनसे घंटो बात की और फिल्माँकन किया। मैने इस विषय पर फिल्म के लिये पूरी दुनिया के विशेषज्ञो से सम्पर्क साधा पर कुछ नही मिला। कौन थे वे लोग और क्या किया उन्होने हमारे ज्ञान का कोई नही जानता। इसी तरह बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र मे दसो विदेशियो को आप वानस्पतिक सर्वेक्षण करते पायेंगे पर उनके शोध परिणाम मुश्किल से देखने मिलेंगे। नीदरलैड के कई प्रकाशनो मे आप कुछ जानकारी पायेंगे पर उसमे भी किससे जानकारी ली गई यह पता नही चलेगा। कई शोध-पत्रो मे उन जानकारियो को बस्तर की जानकारी बताया गया है जो कि पूरे राज्य मे उपयोग हो रही है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि शोधकर्ता दूसरे भागो मे गये ही हो। मै यहाँ एक विज्ञान सम्मेलन मे की गई टिप्पणी बे बारे मे बताना चाहूँगा। इसमे कहा गया कि कौन उपयोगी ज्ञान को छापता है। उपयोगी ज्ञान तो सर्वेक्षण के बाद बेच दिया जाता है और केवल अनुपयोगी भाग को प्रकाशित कर दिया जाता है। यह सब इसलिये भी होता है क्योकि सर्वेक्षणो पर किसी की नजर नही होती है। चूँकि यह तकनीकी क्षेत्र है इसलिये आम जनता का ध्यान इसमे नही जाता। जब मै कृषि की पढाई कर रहा था तो विश्वविद्यालय मे एक सम्मेलन हुआ। उसमे एक वैज्ञानिक दम्पत्ति ने कसा पानी पर शोध पत्र पढा। कसा पानी एक औषधीय पेय है जो कि प्रसव के बाद दिया जाता है। उन्होने पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया था। बाद मे जब मैने बस्तर के जाने-माने पारम्परिक चिकित्सक माननीय विशाल भारत को यह बताया तो उन्होने ऐसे 15 से अधिक शोध पत्रो के बारे मे बताया जिसमे वही बात दोहरायी गई थी। बाद मे पुस्तकालयो मे और अधिक पत्र मिले। अब मन मे प्रश्न उठता है कि क्या एक ही प्रकार के ज्ञान का कई बार दस्तावेजीकरण जरूरी है? निश्चित ही इससे शोधकर्ताओ को बडा नाम मिलता है। उनकी पदोन्नति हो जाती है। पर उन लोगो का कुछ नही होता है जिनका यह ज्ञान होता है। तो क्या इस तरह का दस्तावेजीकरण रोक देना चाहिए? अभी पिछले सप्ताह ही इसी प्रकार के 45 से अधिक भारतीय शोध पत्र दुनिया के अलग-अलग कोनो मे छपे। यह क्रम जारी है। पिछले दिनो मेक्सिको के एक मशरूम विशेषज्ञ ने मुझे देश के एक दुर्लभ मशरूम की तस्वीर भेज कर जानना चाहा कि इसके क्या-क्या उपयोग है। यह आपको कहाँ से मिली तो उनका जवाब था कि आपके देश के वैज्ञानिक हमारे देश मे आकर शोध-पत्र पढकर गये है। उन्होने यह तस्वीर दी है। उन्होने यह भी बताया कि इसके पारम्परिक उपयोग की जानकारी भी उनके पास है। यह सुनकर तो कोई भी विस्मित और चकित हो जायेगा। कोई यह बताने को तैयार नही है कि किस के पास जानकारी होनी चाहिये और किसके पास नही। कौन हमारे मित्र देश है और कौन नही? क्या हमे विदेशियो से बचकर रहना चाहिये? क्यो विदेशी पैसो की ली लिये खडे है पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजाकरण के नाम पर। कौन इनसे हमारे ज्ञान की रक्षा करेगा? शुरू मे ये प्रश्न मुझे परेशान करते रहे। पर बाद मे धीरे-धीरे घाल-मेल का पता लगने लगा। देश की एक प्रतिष्ठित संस्था ने न केवल विदेशी पैसे से दस्तावेजीकरण किया बल्कि उनके बच्चे विदेशो मे पढे। वे खुद विदेश जाते रहते है। पर यह साबित करना सम्भव नही है कि उन्होने ज्ञान गलत हाथो तक पहुँचाया। जैसा कि मैने पहले बताया कि महत्वपूर्ण ज्ञान प्रकाशित नही किया जाता। जब यह दस्तावेज के रूप मे है ही नही तो कोई उस पर अपना दावा कैसे जताये। फिर थोडा बहुत फेर बदल कर पुराने नुस्खो को नया बनाने की बात तो जग जाहिर है। पता ही देश का कितना ज्ञान ऐसे ही बाहर चला गया। धान का की उदाहरण ले। छत्तीसगढ के आम लोगो से नाना प्रकार क़ॆ धान का एकत्रण किया गया फिर यह फिलीपाइंस होते हुये दुनिया भर मे फैल गया। जिनके हवाले इसकी सुरक्षा थी वे विदेशो के दौर करते रहे और बडे पुरूस्कारो से सम्मानित होते रहे। आज आम लोगो के पास न तो पारम्परिक धान है और न ही उस पर उनका अधिकार। ऐसा धान के साथ ही नही हजारो वनस्पतियो के साथ हो रहा है। मै आपको एक रोचक उदाहरण बताता हूँ। छत्तीसगढ के भोपालपटनम मे एक पारम्परिक चिकित्सक है माननीय बी.राव. ग़ोडबोले। वैसे वे कृषि अधिकारी है पर चूँकि वे परम्परागत ज्ञान के उपयोग से लोगो को राहत पहुँचा रहे है इसलिये मैने उन्हे पारम्परिक चिकित्सक का दर्जा दिया है। कुछ वर्षो पहले उन्होने सफेद मूसली की 13 नयी जातियाँ खोजी। जब मैने उनके नाम से इस जानकारी का दस्तावेजीकरण किया तो विभिन्न शोध संस्थाओ ने रूचि दिखाई। मैने कहा कि जातियो का नामकरण गोडबोले जी के नाम पर होना चाहिये। पर मेरी बात नक्कारखाने मे तूती की आवाज साबित हुई। इससे पहले कि इस ज्ञान पर शोध कर्ता अपना दावा करते मैने बी.आर.जी. एक से लेकर तेरह तक उनके नाम पर ही इसका नामकरण करके इंटरनेट पर डाल दिया। यहाँ फायदा हुआ और जब कुछ शोधकर्ता इसे अपनी खोज बताने का प्रयास करने लगे तो सभी ने मेरा लेख आगे कर दिया। यह तो बच गया पर इतने बडे देश मे रोज कितने ही छल हो रहे होंगे कौन जाने और कैसे रोके? पर यह दुख का विषय है कि हमारे शोध संस्थान क्यो नही आगे आये इसे गोडबोले जी के नाम करने? आज भी वे अपने कार्य मे लगे है। बहरहाल, हम यह बात कर रहे थे कि कौन से देश और कौन से लोगो के हाथ मे यह ज्ञान सुरक्षित है? किन पर विश्वास करे। यह तो तय है कि विदेशियो तक ज्ञान पहुँचाने मे खूब पैसे मिलते होंगे विशेषकर अप्रकाशित रूप मे। मुझे समय-समय पर इस क्षेत्र के लोग धकियाते रहते है कि इसे भी खूब पैसा मिल रहा होगा और धकियाने से उन्हे उनका हिस्सा मिल जायेगा। भाई लोग किस क्षेत्र मे नही मिलते? फिर जब वे इकोपोर्ट और दूसरे वेबसाइट वालो से मिलते है जिनमे मै लिखता हूँ तो उन्हे पता चलता है कि पैसे तो मिलते ही नही है तो वे मन मसोसकर चुप हो जाते है। ऐसे ही एक भाई समय-समय पर मुझे धमकाते रहते है कि तुम भारतीयो का ज्ञान बेच रहे हो। अभी कुछ दिनो पहले ही उन्होने फिर यह कार्य किया। बाद मे पता चला कि किसी बडे पुरूस्कार के लिये हम दोनो का नाम एक ही सूचि मे है और बिना आर्थिक सहायता से यह कार्य करने के कारण मेरा पडला भारी है तो उन्होने धमकाना ही उचित समझा। मै तो बार-बार उनसे कहता हूँ कि आप मेरी आय की जाँच करवा ले और अपनी भी। यह भी बता दे कि आप कब-कब विदेश गये, कितने पैसे अब तक दस्तावेजाकरण के लिये आये और देश को क्या दिया। यदि मै दोषी साबित हूँ तो सजा भुगतने को तैयार हूँ। ऐसा लिखने पर वे चुप हो जाते है। पर आज के दिन वे सर्वशक्तिशाली है। जिस दिन चाहे अपने रसूख का लाभ लेकर मुझे नेस्तनाबूत कर सकते है। पर मुझे तो दस्तावेजीकरण का कार्य करना ही है। यह जीवन उसी के लिये समर्पित है। वैसे इस बार मैने उन्हे अपने पारम्परिक चिकित्सको से मिलने का न्यौता दिया है ताकि वे तसल्ली कर सके। उनका कहना है कि मै सारा कुछ उनके डेटाबेस मे डालूँ। मै डेटाबेस की स्थिति से वाकिफ हूँ और मुझे उनकी गतिविधियाँ सन्दिग्ध लगती है। फिर उनका डेटाबेस इंटरनेट पर नही है। कुछ खास लोग ही इसे देख सकते है। वे मेरी जानकारियो को बिना मेरे नाम से डालेंगे। हाँ एवज मे कुछ पैसे भी मिलेंगे। मै लगातार मना कर टालता रहा हूँ। अब जब से मैने मधुमेह पर 45,000 से अधिक पन्ने लिखे है वे बेचैन हो गये है। एक बार उन्होने जब मुझे बुलाया था तो मैने शिकायत की थी कि उनके डेटाबेस की बहुत सी जानकारियाँ सार्वजनिक हो रही है। पर उन्होने ने ध्यान नही दिया। मधुमेह पर दस्तावेजीकरण के बारे मे उन्होने कहा कि आप विदेशियो को सब बता रहे है। मैने उनसे अनुरोध किया कि आप इकोपोर्ट पर जाकर देखे सारी जानकारियाँ तो कूट शब्दो मे है और उसका राज मेरे पास है। मै इसे सुरक्षित हाथो मे ही देना चाहूँगा। हालाकि इकोपोर्ट कूट जानकारियो की इजाजत नही देता पर पूरे दस्तावेजीकरण के नाम पर मै इसे टाल रहा हूँ। आप ही बताये कैसे इस ज्ञान को सुरक्षित किया जाये। इकोपोर्ट के संरक्षक नेल्सन मंडेला और ई.ओ. विलसन जैसे विखयात लोग है। यहाँ ज्ञान की पूरी सुरक्षा होती है। दुनिया भर के पेटेण्ट आफिस इकोपोर्ट की मदद से पारम्परिक ज्ञान का पता लगाते है। मेरे वृहत दस्तावेज से अब इकोपोर्ट को चलने मे परेशानी हो रही है। उन्हे नही पता था कि कोई इतना भी लिख पायेगा जब कि मेरे हिसाब से कुछ भी नही लिखा गया है। मैने इसमे हिन्दी लिख भी डाले है। 30,000 से अधिक तस्वीरे डाली है। भाई लोगो से मै यह कहता हूँ कि यदि मुझे इस ज्ञान से पैसा कमाना होता तो मै इसे लिखता ही क्यो? उनकी तरह थोथी जानकारियो को ही उसमे डालता। जितना कुछ इकोपोर्ट मे लिखा गया है मधुमेह पर अब तक मेरे द्वारा उसे मै बाजार की प्रचलित दरो पर टाइप करवाता तो 5 लाख से कम नही लगते। फिर उसका क्या हिसाब निकालेंगे जो पैसे इन जानकारियो के एकत्रण मे खर्च हुये। मेरा मानना है कि एक दिन दुनिया अवश्य मेरी मेहनत को मानेगी और मुझे सही तरीके से काम करने की अनुमति देगी। पर इन भाई लोगो के एक छ्त्र राज के चलते यह सम्भव नही जान पडता है। मैने घूस के एवज मे सरकारी नौकरी ठुकरायी फिर खर्च कम करने के लिये विवाह नही किया। अब जितना हो सके उतना समय दस्तावेजीकरण मे दे रहा हूँ। (क्रमश)

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