Consultation in Corona Period-78

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Pankaj Oudhia पंकज अवधिया


"डॉक्टर कहते हैं कि मेरे बेटे का उसके शरीर पर से पूरी तरह से नियंत्रण खत्म होता जा रहा है। 


उसे बार-बार पेशाब हो रही है और किसी भी तरह से रुक नहीं रही है। हर बार उसका ब्लेडर पूरी तरह से खाली नहीं हो पा रहा है। 


ब्लेडर काम करना बंद कर रहा है। इसी तरह शरीर के दूसरे हिस्से भी उसके दिमाग की बात को मान नहीं रहे हैं। 


जब हमने चिकित्सकों को इस बारे में बताया तो उन्होंने पूरी जांच करके बताया कि ये पूरे लक्षण Multiple System Atrophy (MSA) की तरह है और इसका कोई इलाज नहीं है। 


वे भरसक प्रयास कर रहे हैं। हम लोगों ने भी किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी है और अपनी ओर से सभी प्रयास कर रहे हैं। 


अभी वर्तमान में चार पद्धति के चिकित्सक बेटे की चिकित्सा कर रहे हैं पर किसी भी तरह से लाभ नहीं हो रहा है।


 हमने आपके आने-जाने की व्यवस्था कर दी है। हम स्वयं वहां आना चाहते थे पर चार चिकित्सकों को साथ में लाना संभव नहीं है। 


जब आप यहां आयेंगे तो ये चारों चिकित्सक यहां उपस्थित रहेंगे और आप इनसे जो भी पूछना चाहेंगे आप पूछ सकते हैं। 


हमें मालूम है कि आप चिकित्सक नहीं है और देश के पारंपरिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। 


फिर भी हमें लगता है कि आपके लंबे अनुभव से हमें कुछ लाभ हो सकता है इसलिए हम आपको आमंत्रित कर रहे हैं। "


पड़ोसी राज्य से जब यह संदेश आया तो मैंने उनसे कहा कि आप पूरी रिपोर्ट भेजें।


 जब मैंने उस रिपोर्ट का अध्ययन किया तो मुझे लगा कि लड़के की हालत बहुत बुरी है और मुझे जल्दी से जाकर उससे मिलना चाहिए।


 मैंने आनन-फानन में गाड़ी की व्यवस्था की और पड़ोसी राज्य की ओर निकल पड़ा। 


वहां जब मैं पहुंचा तो मुझे चार पद्धतियों के चिकित्सकों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ जो कि दिन-रात उस लड़के की चिकित्सा में लगे हुए थे। लड़के की उम्र 30 के आसपास थी।


 मैंने चिकित्सकों की अनुमति से लड़के के पैरों पर जड़ी बूटियों का लेप लगाया और फिर उसकी प्रतिक्रिया देखने के लिए रुक गया।


 10 मिनट के बाद तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगी जिससे लड़के की हालत का साफ साफ अंदाजा लगने लगा। 


मुझे बताया जा रहा था कि उसका दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा है। यह सही नहीं लग रहा था। 


मेरे द्वारा किया गया परीक्षण यह बता रहा था कि उसकी दिमागी हालत ठीक है और इतनी भी बुरी नहीं है कि सब कुछ हाथ से निकल गया हो।


 चारों चिकित्सक उसे 25 से अधिक प्रकार की दवायें दे रहे थे। दवायें इतनी सारी थी कि उसे खाने तक का समय नहीं मिल रहा था। 


मुश्किल इस बात की थी कि उसकी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी और दवाओं से बिल्कुल भी लाभ नहीं हो रहा था।


 शुरू के एक घंटे मैंने आधुनिक चिकित्सक के साथ बिताए और उनसे उनके द्वारा की जा रही चिकित्सा के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। 


फिर लम्बा समय मैंने शेष तीन पद्धतियों के चिकित्सकों से बात करने में लगाया। 


मैंने लड़के के पिता से कहा कि इतनी सारी दवायें देने से तो इनमें आपस में ड्रग इंटरेक्शन होगा और हो सकता है कि लड़के को लाभ होने के स्थान पर और अधिक नुकसान होने लगे।


 आपको जिस भी चिकित्सा पद्धति पर विश्वास है आप उसे पूरे मन से और पूरे विश्वास से अपनाएं। इतनी सारी दवाओं का सेवन निश्चित ही हानिकारक होगा।


 उन्होंने मेरी बात मानी और अपने सभी चिकित्सकों से बात की। 


मैंने एक बार फिर उनसे अनुरोध किया कि आप मुझे यह बताएं कि क्या आप बीमारी की जड़ को समझ रहे हैं और आपकी चिकित्सा कितने दिनों में सफल हो सकती है- आप इस बारे में कुछ बता सकते हैं?


 उन्होंने कहा कि नहीं, ऐसे लक्षण उन्होंने कभी इतनी कम उम्र के युवक में नहीं देखे हैं इसलिए वे तरह-तरह के प्रयोग कर रहे हैं और सभी का एक ही उद्देश्य है कि किसी भी तरह से युवक की समस्या का समाधान हो जाए। 


काफी मशक्कत के बाद लड़के के पिता ने निश्चय किया कि वे वैद्य जी की दवाई ही लेंगे और बाकी पद्धतियों की दवा नहीं लेंगे। 


वैद्य जी से जब मैंने विस्तार से बात की तो उन्होंने बताया कि वे 7 तरह के फॉर्मूलेशंस दे रहे हैं। जब मैंने उन फॉर्मूलेशंस का अध्ययन किया तो पाया कि उनमें बहुत सी औषधीयां बार-बार दोहराई जा रही थी।


 इससे यह लगता था कि वैद्य जी को भी अपनी दवा के ऊपर पूरी तरह से विश्वास नहीं था। उन्होंने एक फार्मूला बताया जिसे ध्यान से देखने पर पता चला कि वह सारस्वतारिष्ट से मिलता जुलता फार्मूला है।


 बस उसमें एक या दो औषधियां और मिला दी गई है। जब मैंने वैद्य जी से इस बात की पुष्टि करनी चाही तो उन्होंने बताया कि दरअसल यह सारस्वतारिष्ट ही है और इसमें उन्होंने दो औषधीयां और मिलाई है। 


मैंने लड़के के पिता से पूछा कि समस्या की शुरुआत कब से हुई तो उन्होंने बताया कि लड़के को बहुत ज्यादा मानसिक तनाव रहता था और वह लंबे समय तक डिप्रेशन का शिकार था। उस समय उसकी केवल 4 दवायें ही चलती थी। 


उन्होंने आगे बताया कि इन चार दवाओं में एक दवा आधुनिक दवा थी जबकि 3 दवाएं वैद्य जी द्वारा दी जा रही थी।


 अब मेरे लिए राह थोड़ी आसान हो गई थी। 


जब मैंने इन चारों दवाओं का अध्ययन किया और उनसे होने वाले संभावित बुरे प्रभाव पर ध्यान दिया तो स्थिति और साफ होने लगी।


मैंने वैद्य जी से कहा कि आप सारस्वतारिष्ट का प्रयोग कुछ समय के लिए रोक दें। हो सकता है कि इससे लड़के की हालत में किसी तरह का सुधार हो।


 इस बात के लिए वे तैयार नहीं हुए और उन्होंने मुझे डराया कि हो सकता है कि इसका प्रयोग रोक देने से कुछ ही  घंटों के अंदर लड़के की हालत बुरी तरह से बिगड़ जाए। 


उन्होंने यह भी कहा कि फिर वे कुछ नहीं कर पाएंगे। 


मैंने लड़के के पिता से कहा कि यदि आपको मुझ पर विश्वास है तो आप सारस्वतारिष्ट का प्रयोग कुछ समय तक रोक कर देखें। भले ही यह समय 12 घंटे का क्यों न हो।


 वे इस बात के लिए तैयार हो गए। मुश्किल से 8 घंटे बीते होंगे कि युवक के सारे लक्षणों में शिथिलता आने लगी और उसकी भूख अचानक से बढ़ गई। 


वैद्य जी भी यह देखकर आश्चर्यचकित थे। उन्होंने अनुमति दी कि अब वे 1 दिन तक सारस्वतारिष्ट का प्रयोग रोकने के लिए तैयार है।


 1 दिन बाद जब लक्षण और कम हो गये और लड़के की स्थिति में सुधार होने लगा तो वैद्य जी ने आज्ञा दी कि सारस्वतारिष्ट को अब एक हफ्ते के लिए रोक दिया जाए।


 एक हफ्ते बाद जब स्थिति में और सुधार होने लगा तो उसकी दवाओं में से एक ही दवा जारी रही और बाकी दवाएं बंद हो गई। 


युवक ने अपने शरीर के सभी अंगों पर नियंत्रण फिर से प्राप्त कर लिया तब मैंने वैद्य जी से कहा कि आप सारस्वतारिष्ट का प्रयोग फिर से आरंभ कर सकते हैं।


  उन्हें इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ और कहा कि जब सारस्वतारिष्ट के कारण ऐसी समस्या हो रही थी तो फिर दोबारा इसे आरंभ करने में क्या तुक है? 


मैंने उन्हें और लड़के के पिता को समझाया कि दोष सारस्वतारिष्ट में नहीं है बल्कि उस सारस्वतारिष्ट में है जिसका प्रयोग वैद्य जी कर रहे थे। 


संभवत: उन्होंने इसे घर में तैयार किया होगा और इसमें प्रयोग किए जाने वाले घटकों को उन्होंने बाजार से खरीदा होगा।


 मैंने उन्हें विस्तार से बताया कि जब सारस्वतारिष्ट के मुख्य घटक घातकी को ऐसे स्थानों से एकत्र किया जाता है जहां कि कई सालों से लंबा सूखा पड़ रहा होता है तब उसमें एक विशेष प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाता है। 


इस घटक को नंगी आंखों से देखने पर इस दोष का पता नहीं चलता है पर जब फार्मूले में इसका प्रयोग किया जाता है तो फार्मूले में उपस्थित ब्राह्मी के साथ इसकी नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है और इन जैसे बहुत से लक्षण आने शुरू हो जाते हैं।


पारंपरिक विधियों से सारस्वतारिष्ट का परीक्षण करने से इस दोष का पता लग जाता है पर यह तभी संभव है जब आपको पहले से अनुभव के आधार पर इस दोष का पता हो।


 कई बार अलग-अलग कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे सारस्वतारिष्ट में भी ऐसी परेशानी आ जाती है क्योंकि कंपनियों को पता नहीं होता है कि उन्होंने जहां से इस घटक को खरीदा है वहां सूखा पड़ा था या नहीं। 


वे इस बात पर ध्यान भी नहीं देती हैं। इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जो लंबे समय तक ऐसे सारस्वतारिष्ट का प्रयोग करते हैं। 


वैद्य जी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया और मुझे धन्यवाद ज्ञापित किया।


 उन्होंने मेरे ज्ञान की तारीफ की तो मैंने उनसे कहा कि यह मेरा ज्ञान नहीं है। मैंने यह भारत के पारंपरिक चिकित्सकों से जाना है और परीक्षण की विधि भी उन्हीं से सीखी है। 


अब युवक की हालत में काफी सुधार हो गया था और उसे केवल सारस्वतारिष्ट ही दिया जा रहा था। 


इस विषय में सारी बातें सुनकर उनके तीनों विशेषज्ञ चिकित्सक भी हैरान थे। यह उनके लिए भी नई जानकारी थी।


 लड़के के पिता ने धन्यवाद दिया और कहा कि आपको इस बारे में विस्तार से अपने लेखों में लिखना चाहिए ताकि विशेषज्ञों को इस बात का पता चल सके।


 मैंने उन्हें बताया कि मैंने इंटरनेट आर्काइव में ड्रग इंटरेक्शन पर जो 35 हजार से अधिक शोध ग्रंथ प्रकाशित किए हैं उनमें यही बात स्पष्ट की गई है।


 मुझे उम्मीद है कि युवा पीढ़ी के विशेषज्ञ इन ग्रंथों का अध्ययन करेंगे और ड्रग इंटरेक्शन के कारण होने वाली वाली मौतों को रोक सकने में अपनी अहम भूमिका निभाएंगे।


 मुझे युवा पीढ़ी से बहुत अधिक उम्मीदें हैं। 


सर्वाधिकार सुरक्षित




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