Consultation in Corona Period-83

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Pankaj Oudhia पंकज अवधिया


"पिछले 10 वर्षों से मैं प्रोस्टेट कैंसर से पूरी तरह से बचा रहा अर्थात इन 10 वर्षों में वह कैंसर की प्रथम अवस्था ही रही।


 आपने जिस पारंपरिक चिकित्सक के पास मुझे भेजा था उनकी दवा ने कमाल का असर दिखाया। 


मैं अभी भी वही दवा ले रहा हूँ लेकिन उसमें पहले जैसा असर नहीं है। यही कारण है कि 2018 से जब इस कैंसर ने बहुत तेजी से फैलना शुरू किया तो वह दो सालों में फर्स्ट स्टेज से लास्ट स्टेज में आ गया।


 अब तो उन पारंपरिक चिकित्सक ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं इसलिए मैं आपके पास आया हूँ कि हो सकता है कि आप मुझे नया जीवन प्रदान कर सकें।"


 65 वर्षीय एक बुजुर्ग ने मुझे फोन पर संदेश भेजा और इच्छा जताई कि वे मुझसे बात करना चाहते हैं और यदि संभव हो तो रायपुर आकर मिलना चाहते हैं।


 मुझे याद आया कि 2009 में उन्होंने मुझसे संपर्क किया था।


उस समय जब उन्होंने प्रोस्टेट की जांच कराई थी तो उन्हें बताया गया था कि उन्हें फर्स्ट स्टेज का प्रोस्टेट कैंसर है।


 उन्हें सलाह दी गई थी कि वे तुरंत सर्जरी करवा लें ताकि कैंसर को फैलने से रोका जा सके पर वे सर्जरी के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वे डायबिटिक थे और उन्हें दूसरी तरह की और भी समस्याएं थी।


 जब वे मुझसे मिलने आये तो मैंने कहा कि मैं चिकित्सक नहीं हूँ पर आप चाहे तो मैं आपको ऐसे पारंपरिक चिकित्सकों से मिलवा सकता हूँ जो कि इस तरह की चिकित्सा में दक्ष है।


 वे इस बात के लिए तैयार हो गए। तब मैं उनको अपने साथ लेकर बस्तर के एक पारंपरिक चिकित्सक के पास गया। 


पारंपरिक चिकित्सक ने उनके तलवों पर जड़ी बूटियों का लेप लगाया और फिर आधे घंटे बाद उनके शरीर में आ रहे लक्षणों की जांच की। 


उस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि इस कैंसर को ठीक किया जा सकता है।


 उसके बाद उन्होंने नियमित रूप से उन बुजुर्ग को दवा देने की योजना बनाई और यह अच्छी बात थी कि बुजुर्ग भी लगातार बस्तर आकर उनसे चिकित्सा करवाने को तैयार थे। 


मेरी भूमिका यही तक थी। उसके बाद मेरा उनसे किसी तरह का संपर्क नहीं रहा।


 आज 10-11 सालों के बाद जब उन्होंने मुझसे फिर से संपर्क किया तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनका कैंसर बहुत अधिक फैल चुका था और अब यह मेटास्टैटिक प्रोस्टेट कैंसर हो गया था।


 वे बहुत ज्यादा दर्द में थे और उन्हें हमेशा ही बुखार चढ़ा रहता था। 


उन्होंने मुझे बताया कि अब वे पारंपरिक चिकित्सक दुनिया में नहीं है। उनका बेटा अपने पिता के ज्ञान के आधार पर दवाई देता है।


 बुजुर्ग सज्जन चाहते थे कि मैं एक बार उनके साथ बस्तर चलकर उस पारंपरिक चिकित्सक के बेटे से मिलूँ और उस फार्मूले की जांच करूं ताकि यह पता चल सके कि बेटे द्वारा उपयोग किया जा रहा है फार्मूला कहीं उनके लिए अभिशाप तो नहीं बन गया।


 मैंने उनकी बात मानी और उनके साथ बस्तर की ओर रवाना हो गया। 


पारम्परिक चिकित्सक के बेटे ने बताया कि वह वही फॉर्मूला इस्तेमाल कर रहा है जो उसके पिताजी कर रहे थे। 


उसमें बिल्कुल भी फेरबदल नहीं किया गया है पर उसने बताया कि उसे भी आश्चर्य होता है कि कैसे दो साल पहले इन सज्जन का कैंसर इतनी तेजी से फैलना शुरू हुआ कि किसी भी तरह से काबू में नहीं आया।


 मैंने उन सज्जन से कहा कि नुस्खे में तो किसी भी प्रकार की कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती है।


 कैंसर जिस तेजी से फैला है उसके लिए मेरे पास भी किसी प्रकार की दवा नहीं है।


 हां, कुछ प्रकार के मेडिसिनल राईस मेरे पास हैं। अगर आप चाहे तो मैं आपको इन्हें दे सकता हूँ। 


ये राइस आपके कैंसर को फैलने से रोकेंगे और अभी जो आपको तकलीफ हो रही है उन्हें दूर करने में मदद करेंगे।


 तब उन्होंने बताया कि वे पहले से ही मेडिसिनल राइस का प्रयोग कर रहे हैं।


 मैंने उनसे पूछा कि आप कौन से मेडिसनल राइस का प्रयोग कर रहे हैं और इसकी सलाह आपको किसने दी?


 क्या पारंपरिक चिकित्सक ने आपको यह मेडिसिनल राइस दिया है? 


तब उन्होंने खुलासा किया कि 2018 में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने दुनियाभर के अखबारों में यह प्रकाशित किया था कि छत्तीसगढ़ का लाइचा नाम मेडिसिनल राइस कैंसर की कोशिकाओं को पूरी तरह से नष्ट कर देता है और उन्होंने अनुमोदित किया था कि प्रतिदिन इसका प्रयोग करने से न केवल कैंसर से सुरक्षा होती है बल्कि कैंसर ठीक भी हो जाता है। 


इसीलिए वे सज्जन स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय की मदद से प्राप्त किए गए लाइचा धान का प्रयोग कर रहे हैं।


 अब सारी स्थिति साफ हो चुकी थी। 


मैंने उन्हें विस्तार से बताया कि लाइचा धान का प्रयोग छत्तीसगढ़ के पारंपरिक चिकित्सक पीढ़ियों से कैंसर और दूसरे रोगों के चिकित्सा में कर रहे हैं पर इसका प्रयोग इतना आसान नहीं है जितना कि बताया जाता है।


 यह एक नग्न सत्य है कि यदि इस धान को पूरी तरह से शोधित किए बिना किसी प्रकार के कैंसर में उपयोग किया जाता है तो बहुत से मामलों में कैंसर ठीक होने की बजाय बहुत तेजी से बढ़ने लग जाता है।


मैंने उन्हें एक शोध दस्तावेज दिखाया जिसे मैंने वर्ष 2005 में ऑनलाइन किया था। इस दस्तावेज में बताया गया था कि जब छत्तीसगढ़ के पारंपरिक चिकित्सक लाइचा धान का उपयोग करते हैं तो वे कई तरह के प्रयोग करते हैं जिससे लाइचा धान के दोषों का समाधान हो जाए। 


लाइचा धान की खेती के समय कई प्रकार की वनस्पतियों के सत्व को खेत में डाला जाता है और चावल को भी लंबे समय तक विभिन्न जड़ी बूटियों के घोलों से शोधित किया जाता है। उसके बाद ही उसका प्रयोग कैंसर की चिकित्सा के लिए किया जाता है। 


भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने यह ज्ञान तो छत्तीसगढ़ से प्राप्त कर लिया है कि यह धान कैंसर की चिकित्सा में उपयोगी है पर पूरा ज्ञान उन्होंने एकत्र नहीं किया। 


आनन-फानन में उन्होंने प्रयोगशाला जीवो पर प्रयोग कर लिए और बिना छत्तीसगढ़ के पारंपरिक चिकित्सकों का नाम लिए एक शोध पत्र प्रकाशित कर दिया जिसमें कहा गया कि लाइचा धान से कैंसर के सेल मर जाते हैं। 


इस शोध निष्कर्ष को दुनिया भर के अखबारों ने प्रमुखता से छापा। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि क्या मनुष्यों पर इस तरह के प्रयोग किए गए और यदि हां तो कितने लंबे समय तक किए गए?


 क्या प्रयोग के समय इस बात का ध्यान रखा गया या इस तरह के अध्ययन किए गए कि इस चावल से कैंसर फैल भी सकता है? 


अखबारों की खबरों से प्रभावित होकर बहुत से लोगों ने लाइचा का प्रयोग करना शुरू कर दिया।


 क्योंकि शोध पत्र में किसी प्रकार के शोधन की बात नहीं की गई थी और संभवत: वैज्ञानिक इस बारे में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक चिकित्सकों से ज्ञान लेकर नहीं गए थे इसलिए उन्होंने शोधन के बारे में कुछ नहीं कहा।


 परिणाम यह हुआ कि बहुत से लोग जिन्हें कैंसर हुआ था और जब उन्होंने इस चावल का प्रयोग किया तो वह तेजी से फैलने लगा।


 किसी ने सपने ने भी यह नहीं सोचा कि उनके द्वारा लिए जा रहे हैं मेडिसिनल राईस के कारण ऐसा हो रहा है।


 यही आपके साथ भी हुआ। 


2018 तक जब तक आपने यह समाचार नहीं पढ़ा था तब तक आपका कैंसर नियंत्रण में रहा और उसके बाद जब आपने इस बिना शोधित चावल का प्रयोग करना शुरू किया तो आपका कैंसर बहुत तेजी से फैलने लगा।


 यह अच्छी बात है कि आपने बातों ही बातों में बता दिया कि आप इस चावल का प्रयोग कर रहे हैं। 


छत्तीसगढ़ की पारंपरिक चिकित्सा में ऐसी बहुत सारी औषधीयां है जिनका प्रयोग इस चावल से होने वाले दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है। अभी भी देर नहीं हुई है।


 आप फिर से उस पारम्परिक चिकित्सक के पास जाएं। मैं उन्हें निर्देश दे देता हूँ कि कौन सी दवाओं का प्रयोग करना है जिससे कि लाइचा के दोषों का समाधान हो जाए।


 मुझे उम्मीद है कि बहुत जल्दी आपको लाभ होगा और हो सकता है कि आप कुछ महीनों में इस विकट महा रोग से पूरी तरह से मुक्त हो जाए।


 उन्होंने धन्यवाद ज्ञापित किया।


 सर्वाधिकार सुरक्षित

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