Saturday, February 23, 2008

पारम्परिक चिकित्सको की नुमाइश का खेल अब बन्द हो

पारम्परिक चिकित्सको की नुमाइश का खेल अब बन्द हो

- पंकज अवधिया

पिछले दिनो मेरे एक मित्र ने मुझे फोन कर कहा कि एक छोटा सा आयोजन है जिसमे उनके कुछ फिल्मकार मित्र दिल्ली से आ रहे है, तुम कुछ पारम्परिक चिकित्सको को भेज देना। क्यो? ये फिल्मकार उनसे बात करेंगे। इस तरह के फोन मेरे लिये नयी बात नही है। हर कोई चाहता है कि मैने जिन पारम्परिक चिकित्सको बे बीच काम किया है उनसे मिलकर कुछ जाना जाये। यह उद्देश्य पवित्र हो तो इसमे कोई बुराई नही है। पर इस दिशा मे मेरा अनुभव अच्छा नही रहा है। मैने अपने मित्र से पूछा कि पारम्परिक चिकित्सको को इससे क्या मिलेगा? उसका उत्तर था कि दो समय का खाना खिला देंगे और आने-जाने का खर्च दे देंगे। मैने पूछा, और उसका क्या जो फिल्मकार इन फिल्मो को बेचकर कमायेंगे। फिर इन फिल्मो से नये लोग आयेंगे। वे भी यही करेंगे। कुछ ऐसे लोग भी आयेंगे जो दबावपूर्वक उनसे राज उगलवाना चाहेंगे। हो सकता है कि वे ऐसे प्रयास फिल्म को रोचक और सनसनीखेज बनाने के लिये करे। इससे पारम्परिक चिकित्सको को तो कुछ हासिल नही होने वाला। यह भी जरुरी नही है कि फिल्मकार केवल पारम्परिक चिकित्सको का पक्ष दिखाये। हो सकता है वे इसमे आधुनिक चिकित्सको के कथन जोड दे कि ये आम लोगो के लिये खतरा है। इससे अच्छा तो यही है कि वे अपने परिवेश मे रहे और वैसे ही आम लोगो की सेवा करते रहे जैसे वे पीढीयो से करते रहे है। मै क्यो सब कुछ जानते बूझते हुये इस खेल मे शामिल हो जाऊँ, सिर्फ नाम के लिये। इसलिये मै व्यस्तता का बहाना कर इससे दूर ही रहना पसन्द करता हूँ।

बतौर सलाहकार अहमदाबाद सहित देश के बडे शहरो के कई संस्थानो मे मेरा जाना हुआ है जहाँ पारम्परिक चिकित्सको की नुमाइश आम है। कभी कोई राजनेता इनके साथ तस्वीरे खिचवाता है तो कभी संस्थानो के मुखिया। पर कोई यह प्रयास नही करता कि इन्हे समाज की मुख्यधारा मे लाया जाये। इनके ज्ञान के आधार पर इंन्हे सेवा करने की छूट दी जाये। इन्हे कानूनी सहायता मिले। मेरे मित्र कहते है कि ऐसे आयोजनो मे इनकी उपस्थिति ही से इन्हे कानूनी मान्यता मिलेगी। पर वास्तव मे ऐसा नही है। आयोजन के बाद इन्हे भुला दिया जाता है। फिर तब याद किया जाता है जब अगला आयोजन होता है। पारम्परिक चिकित्सको और पारम्परिक ज्ञान के नाम पर विदेशो से बहुत पैसा मिलता है। जंगल विभाग वाले भी इसी चक्कर मे इस तरह के आयोजन करते है। मै अतिथि वक्ता के रूप मे इन आयोजनो मे गया हूँ। मुझे पारम्परिक चिकित्सक कुछ सहमे हुये लगे। कई बार शिकायत मिली कि उनसे कैमरे के सामने सारे राज उगलवाने के लिये दबाव बनाया गया। वे शिकायत करे भी तो किससे?

विदेशी सैलानियो के साथ आये स्थानीय अधिकारी भी मुझसे पारम्परिक चिकित्सको को मिलवाने की बात करते है। मै कहता हूँ कि पहले आप बायोडायवर्सिटी बोर्ड से अनुमति ले लीजिये फिर मै आपकी मदद करूंगा। इस पर अधिकारी कहते है कि विदेशी हमारे मेहमान है और किसी भी कीमत पर हमे उन्हे खुश रखना है। मै पारम्परिक ज्ञान पर खतरे की कीमत पर मेहमाननवाजी के लिये तैयार नही हूँ। छत्तीसग़ढ मे तो हजारो पारम्परिक चिकित्सक है और मैने अपने लेखो मे उनके विषय मे लिखा है। इसी सहारे अधिकारी उन तक जा पहुँचते है और उन्हे परेशान करने लगते है। हाल ही मे मैदानी इलाके के एक पारम्परिक चिकित्सक ने शिकायत की कि एक ही प्रकार से जडी-बूटी एकत्र करने को कई बार फिल्माया गया। सम्भवत: रिटेक से वे परेशान हो गये थे। एक फिल्म की शूटिंग कई सप्ताह तक चलती है। यही कारण है कि वे बडा ही असहज महसूस करते है।

आने वाले दिनो मे यह सब और बढने वाला है। आवश्यकता इस बात का है कि आचार-सन्हिता तैयार की जाये ताकि इन प्रकृति पुत्रो को कम से कम परेशानी हो। यह तभी सम्भव है जब हमारा समाज सही मायने मे इनके महत्व को समझे और इन्हे अपनाये।

सम्बन्धित आलेख

पंकज अवधिया (2007). काँटे ही काँटे है पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Monday, February 18, 2008

मधुमेह की वैज्ञानिक रपट मे प्रगति

मधुमेह पर तैयार की जा रही वैज्ञानिक रपट मे अब तक 59,000 से अधिक साप्ताहिक तालिकाए जोडी जा चुकी है। इन्हे मिलाकर अब तक 75,000 से अधिक पृष्ठ लिखे जा चुके है। अभी मेथी पर केन्द्रित अध्याय लिखा जा रहा है। विशेष उपचार क्रमाँक 266 अर्थात जी-मेथी 48 के विषय मे लिखा जा रहा है। आप इस कडी पर जाकर विस्तार जान सकते है।
http://ecoport.org/ep?SearchType=interactiveTableView&itableId=51069

कुल तालिकाए 200,000 से अधिक है। अभी 100-150 तालिकाए प्रतिदिन के हिसाब से जोडी जा रही है। इससे लगता है कि कुछ और वर्ष लगेंगे इस रपट को पूरा होने मे।

Thursday, February 7, 2008

क्या हम तैयार है मुम्बई मे सुनामी के कहर के लिये?

क्या हम तैयार है मुम्बई मे सुनामी के कहर के लिये?

- पंकज अवधिया

पिछले वर्ष मै मुम्बई के आस-पास उपलब्ध वनस्पतियो की तस्वीरे उतार रहा था। मेरे साथ मेरे मित्र भी थे। दिन भर मेरे इस काम को देखकर वे उकता गये। कहने लगे कि लोग मुम्बई घूमने आते है और आप यहाँ बेकार पौधो के पीछे पडे है। मैने उन्हे इस कार्य का उद्देश्य बताते हुये कहा कि मै इन वनस्पतियो के आधार पर ऐसी वनस्पतियो की सूची तैयार करना चाहता हूँ जो कि सुनामी के समय आपातकाल मे मुसीबत मे फँसे लोगो के काम आ सके। तो वे मजाक उडाते हुये बोले कि मुम्बई मे सुनामी आने से रहा। भगवान करे कि उनकी बात सच निकले क्योकि यदि यह प्राकृतिक आपदा इस शहर मे आयी तो तबाही मच जायेगी। सब जानते है कि समुद्र के किनारे बसे शहरो के लिये सुनामी एक बडी चुनौती है पर फिर भी सब इस नंगे सच से परदा किये बैठे है। सुनामी का कहर किसी भी समय आ सकता है।

कुछ वर्ष पहले जब पहली बार सुनामी ने भारत देश के चरण स्पर्श किये थे तो तबाही का जो मंजर दिखा उससे हम सभी परिचित है। शुरु के कुछ घंटे महत्वपूर्ण थे क्योकि उस समय तक मदद पहुँचा पाना सम्भव नही था। उडीसा के चक्रवात के समय भी शुरु के कुछ घंटे बहुत महत्वपूर्ण रहे और यदि उस समय मदद पहुँच जाती तो काफी जान बचायी जा सकती थी। सुनामी के कुछ माह बाद जब मै प्रभावित भाग मे गया तो वहाँ की वनस्पति देखकर ठगा सा खडा रहा। इन वनस्पतियो के सरल प्रयोग से लोग अपने और अपने आस-पास के लोगो की मदद कर सकते थे। इनसे न केवल दर्द से मुक्ति पायी जा सकती थी बल्कि भूख भी कुछ समय के लिये मिटायी जा सकती थी। पर उस भाग के ज्यादातर लोगो को ये सरल प्रयोग मालूम नही थे। वे आधुनिक चिकित्सा साधनो के लिये बैठे रहे। सैकडो लोगो के लिये यह इंतजार अंतहीन साबित हुआ।

अमेरिका मे हरीकेन कैटरीना के बाद मची तबाही पर मैने एक शोध आलेख लिखा और योजनाकर्ताओ को बताया कि कैसे इस समय वहाँ मिलने वाली वनस्पतियाँ पीडीतो के लिये वरदान साबित हो सकती थी। मुझे बहुत से सन्देश आये कि आपको इस तूफान और अमेरीकी वनस्पतियो के विषय मे जानकारी कहाँ से मिली? मैने समाचार चैनलो मे सारा मंजर देखा फिर इंटरनेट पर वनस्पतियो की सूची का अध्ययन किया। बहुत सी वनस्पतियाँ भारत मे भी पायी जाती है जो अमेरीकी मूल की है। उसी आधार पर यह शोध लेख लिख डाला। ज्यादातर लोगो ने शुभकामनाए दी पर कुछ शोधकर्ताओ ने धकिया भी।

मेरी योजना देश के विभिन्न भागो मे पायी जाने वाली वनस्पतियो के आधार पर एक सरल किट तैयार करने की है जिसमे वनस्पतियो की पहचान की चित्रो सहित जानकारी के साथ उनके सरल प्रयोग हो। ये किट प्रभावित क्षेत्रो मे सरकार मुफ्त मे उपलब्ध करवाये ताकि आपातकाल मे ये काम आ सके। इससे भी अच्छा यह होगा कि यह किट बच्चो की शिक्षा का एक अंग हो जाये ताकि एक पूरी पीढी इसकी सहायता से समय-समय पर लोगो की रक्षा कर सके। हर भाग के लिये अलग किट की जरुरत होगी। एक ही किट मे कई तरह की आपातस्थितियो से बचने की जानकारियाँ होंगी।

मुम्बई मे मैने 500 से अधिक उपयोगी वनस्पतियो की सूची तैयार की है। इनमे से 55 को मैने सर्वाधिक उपयुक्त पाया है। अपने अध्ययन के दौरान मैने दसो लोगो से यह जानने की कोशिश की कि सुनामी आने पर वे क्या करेंगे? चूँकि ज्यादातर लोग बेफिक्र थे और उन्हे कभी किसी ने बताया नही था उपायो के विषय मे इसलिये वे जवाब देने मे असमर्थ रहे। बतौर आम नागरिक मै इस अनदेखी के खिलाफ हूँ। मुझे लगता है कि व्यापक जन-जागरण की जरुरत है। कुछ विशेषज्ञो ने बताया कि अब हमारे पास पूर्व सूचना देने वाले यंत्र है इसलिये घबराने की बात नही है। पर आप ही बताइये क्या कुछ घंटो की पूर्व सूचना के आधार पर बिना तैयारी से शहर को खाली करवाना सम्भव है? कही अनावश्यक भगदड अकाल मौतो का सबब न बन जाये।

मेरे इस लेख से आप लोगो को बुरा भी लग सकता है पर मुझे लगता है कि बतौर चेतावनी इस लेख को लिया जाना चाहिये। यदि सरकार सचेत न हो तो जागरुक लोग ही आपस मे मिलकर जन-जागरण के इस कार्य का बीडा उठा सकते है। मै सदा ऐसे कार्यो मे सहयोग के लिये तत्पर हूँ।

सम्बन्धित आलेख

पंकज अवधिया (2006). कौन दे सकता है सुनामी की पूर्व सूचना?

Oudhia, P. (2006-2007). Natural Disasters like Hurricane Katrina : Can Local Herbs Reduce the Sufferings of Victims? Ecoport.org

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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Saturday, February 2, 2008

जनवरी माह मे छत्तीसगढ की जैव-विविधता पर प्रकाशित शोध आलेख

शोध आलेखो की सूची आप इस कडी पर जाकर देख सकते है।

http://cgbiodiversity.blogspot.com/2008/01/research-articlesreports-published-in_25.html