कोरोनामुक्त घर बनाने की कवायद

Consultation in Corona Period-13

Pankaj Oudhia पंकज अवधिया


कोरोनामुक्त घर बनाने की कवायद


"कोरोना का कहर यदि इसी तरह कई वर्षों तक जारी रहा तो कॉंक्रीट जंगल को पूरी तरह से खत्म करना होगा और उसके स्थान पर दूसरी स्टाइल के घरों को बनाना होगा जिसमें समुचित हवा का प्रबंध हो और साथ ही कोरोना के अंदर घुसने की बिल्कुल भी संभावना न हो। हम लोग ऐसे ही एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। क्या आप इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना पसंद करेंगे?" ऑस्ट्रेलिया की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने मुझे प्रस्ताव भेजते हुए यह लिखा कि कंपनी ऐसे घरों का निर्माण करना चाहती है जिसमें समुचित हवा का आना जाना हो और साथ ही किसी भी हालत में उसमें रहने वाले लोगों को कोरोनावायरस का संक्रमण न हो।


 ऐसे घरों की डिजाइन के लिए उसने दुनिया भर के विशेषज्ञों को एक मंच पर एकत्रित किया है और अब सब मिलकर ऐसे आदर्श घर का खाका तैयार कर रहे हैं। 


इस प्रोजेक्ट में मुझे बतौर वनस्पति विशेषज्ञ रखा गया है। 


मुझे यह बताना है कि ऐसे कौन से पौधे हैं जिनको गृह वाटिका और घर के अंदर लगाने से घर पूरी तरह से कोरोना से मुक्त हो सकता है।


 पहले चरण में 20 प्रकार के घरों का ट्रायल होगा और फिर उसके बाद प्रभावी घरों को मॉडल के रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाएगा और जो देश चाहेंगे उस देश में जाकर इस तरह के घर निर्मित किए जाएंगे।


 जैसा कि कहते हैं कि संकट से ही अवसर उत्पन्न होते हैं, इस कंपनी ने दूरदर्शिता का परिचय दिया है और अभी से कोरोनावायरस मुक्त घर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।


 मैंने उनसे कहा है कि आमतौर पर घरों में लगाए जाने वाले पौधों से बचा जाए और ऐसे पौधों का इस्तेमाल किया जाए जिनका प्रयोग अभी तक नहीं हुआ है और जो वास्तव में एंटीवायरल प्रॉपर्टीज वाले हैं पर दुनिया के सामने अनजाने हैं।


 बहुत वर्षों पहले मैंने उत्तर भारत के एक हेल्थ रिसॉर्ट के लिए बहुत सारे काटेज बना कर दिए थे। ये कॉटेजेस उस हेल्थ रिसॉर्ट में आने वाले विभिन्न रोगों से पीड़ित लोगों के लिए थे।


 इन कॉटेजेस में वे रुकते थे और कॉटेजेस के प्रभाव के कारण उनकी तकलीफों में कमी होती थी। ये बड़ी विशिष्ट तकनीक से बनाए जाते थे। 


कॉटेज बनाने में मिट्टी के साथ नाना प्रकार की जड़ी बूटियों को मिलाया जाता था और फिर रोगियों को अधिक से अधिक समय उसमे रहने के लिए कहा जाता था। 


यहीं उन्हें दवा दी जाती थी और इस तरह पूरी तरह से उनकी चिकित्सा की जाती थी। 


उस समय उस रिसोर्ट में डायबिटीज वाली कॉटेज बड़ी प्रसिद्ध हुआ करती थी और उसे बुक करने के लिए सालों का इंतजार करना पड़ता था।


इन्हीं कॉटेज से प्रभावित होकर सिंगापुर के एक बिजनेस टाइकून ने मुझसे संपर्क किया था। अपने बंगले में निजी कॉटेज बनाने के लिए। 


वे सोरायसिस रोग से प्रभावित थे और जब भी उनकी समस्या बढ़ जाती थी तो वे बेचैन हो जाते थे। उनपर कोई दवा असर नहीं करती थी।


 ऐसे में उनका कहना था कि यदि मैं उन्हें ऐसा कॉटेज बना कर दूं जहां रहने से उन्हें पल भर के लिए भी सोरायसिस की समस्या से मुक्ति मिल जाए तो बड़ा एहसान होगा।


 मैंने उनके पास पूरी जानकारी भेजी और भारतीय जड़ी बूटियों के इस्तेमाल के स्थान पर सिंगापुर की स्थानीय वनस्पतियों का प्रयोग किया ताकि उन्हें आगे किसी प्रकार की परेशानी न हो। 


मैंने उन्हें बताया कि यह कॉटेज 1 साल तक प्रभावी है। उसके बाद जड़ी बूटियों का लेप दीवारों पर फिर से करना होगा। 


क्योंकि वे साधन संबंध संपन्न थे इसलिए उन्होंने हर 1 महीने में इसे तोड़कर नया कॉटेज बनाने का प्रबंध किया और बाद में उन्होंने लिखा कि वे अपने ऑफिस को भी उसी कॉटेज में शिफ्ट कर चुके हैं। इससे उन्हें निश्चित ही लाभ हो रहा था।


 मुंबई के एक प्रसिद्ध मनोचिकित्सक ने मुझे उन रोगियों के लिए कॉटेज बनाने का निर्देश दिया जोकि पागलपन के कारण बहुत उग्र अवस्था में पहुंच जाते थे और अपने आप को घायल कर लेते थे। 


मनोचिकित्सक तेज दवाओं के पक्ष में नहीं थे पर उनके पास और कोई विकल्प नहीं था। 


मैंने उनके लिए पांच कॉटेज बना कर दिए। बाद में यह संख्या बढ़ते बढ़ते 20 तक हो गई। हम हर 2 साल में उन्हें कॉटेज का नवीनीकरण करके दे देते हैं।


 कोरोना काल में मैंने 50 से अधिक ऐसे कॉटेज का डिजाइन तैयार किया है और इंतजार कर रहा हूं नव उद्यमियों का जो इस दिशा में पहल करें और कोरोनावायरस मुक्त घर बनाने की कोशिश को आगे बढ़ाएं। 


ऑस्ट्रेलिया की कंपनी अभी दीवारों में जड़ी-बूटी लगाने और बिल्डिंग मटेरियल में जड़ी-बूटी मिलाने की योजना पर काम नहीं कर रही है।


भविष्य में अगर उनकी ऐसी की कोई योजना शुरू हुई तो मैं जरूर उनके साथ जुड़ना पसंद करूंगा।


 कोरोना इतनी जल्दी से और इतनी तेजी से फैला कि कुछ उपाय करने का समय सरकारों के पास नहीं रहा अन्यथा मैं उन्हें सुझाव देता कि इसी भारतीय पारंपरिक चिकित्सकीय ज्ञान के आधार पर क्वॉरेंटाइन सेंटर बनाए जाए ताकि कोरोना का अधिक विस्तार न हो और कोरोनावायरस प्रभावित ऐसे कॉटेज में रहने से प्रभावी तरीके से ठीक हो सके।


आने वाले दिनों में जब सरकारों को थोड़ी सांस लेने की फुर्सत मिलेगी तब ऐसे उपाय उन्हें समझाये जा सकते हैं और मुझे उम्मीद है कि अपनी जनता को बचाने के लिए हमारी सरकारें हर संभव प्रयास करेंगी।


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