Collection of my popular articles in Hindi. by Pankaj Oudhia

Collection of my popular articles in Hindi.by
Pankaj Oudhia

Contributor:Dr. Pankaj Oudhia
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ID: 3180

 

Abstract




Table of Contents
भैंस की च्यूंगम भला मनुष्य क्यो खा रहा?
- पंकज अवधिया 
--- तो इसलिये नष्ट किया जा रहा है रतनजोत (जैट्रोफा) भारतीय किसानो द्वारा
- पंकज अवधिया 
आखिर कब तक होती रहेगी भारतीय सम्पदा की चोरी इस तरह?
- पंकज अवधिया 
किसानो और पारम्परिक चिकित्सको के गठबन्धन मे ही निहित है औषधीय और सगन्ध फसलो का सुनहरा भविष्य़
- पंकज अवधिया
क्या आप करेंगे औषधीय फसलो की माँग-आधारित विशेष खेती?
- पंकज अवधिया


भैंस की च्यूंगम भला मनुष्य क्यो खा रहा?
- पंकज अवधिया 
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कुछ दिनो पहले की बात है मेरे साथ टेबल टेनिस खेलने एक सज्जन आये स्थानीय क्लब मे। खेल से पहले ही उन्होने च्यूंगम का पैकेट निकाला और मुझसे लेने को कहा। अपने छोटे बच्चो को भी उन्होने इसे दी। मैने धन्यवाद कहते हुये इंकार कर दिया। वे बोले यह शुगर फ्री है। मैने कहा कि मेरे न लेने के दूसरे कारण है। बहुत पूछने पर मैने बताया कि यह बच्चो के लिये नही है और इसमे ऐसा तत्व है जो किडनी के लिये नुकसानदायक है। वे हँसने लगे। उन्होने समझा कि मै मजाक कर रहा हूँ। मैने उनसे पैकेट माँगा और फिर उसमे बारीक अक्षरो मे अंकित कुछ पंक्तियाँ पढवा दी। उसमे साफ लिखा था ‘नाट फार माइनर्स’। साथ की एक रसायन का नाम लिखा था। वे चौक पडे। उन्होने घर फोन लगाया और अपनी पत्नी से इंटरनेट पर इस रसायन के बारे मे पता करने को कहा। दस मिनट के अन्दर फोन आया कि हाँ यह रसायन किडनी के लिये अभिशाप है और किडनी के रोगो से प्रभावित रोगियो को तो इसे खाना ही नही चाहिये।

आज ऐसे उत्पाद हमारे देश मे बहुत चलते है। च्यूंगम खाइये और दाँतो को सुन्दर बनाइये। पर साथ मे ढेरो रोग मुफ्त पाइये। जानकारी मिलने के बाद सज्जन को लगा कि मैने उन्हे उनके बच्चो के सामने नीचा दिखा दिया है। बोले ‘अरे, कुछ नही होता। जो डर गया वो मर गया।‘ मैने मन मे कहा ‘जो नही डरा वो और जल्दी मर गया।‘ वे सज्जन बाद मे बोले कि यह चेतावनी बडे अक्षरो मे लिखी जानी चाहिये। पर ऐसा करने से कुछ फर्क थोडे ही पडेगा। सिगरेट के पैकेटो मे जैसे-जैसे चेतावनी की पंक्ति बडी होती गयी वैसे-वैसे इसे पीने वाले भी बढते गये। यह हकीकत है। ‘अरे मरना तो सबको है एक दिन। आज ऐश करो।‘ आज यह जीवन का फलसफा बन गया है। आम लोग ऐश कर रहे है कुछ समय के लिये फिर आधुनिक चिकित्सा तंत्र इसे एनकैश कर रहा है जिन्दगी भर के लिये। आज भारत विश्व की मधुमेह राजधानी बन चुका है। थोडे दिन रुक जाइये शायद ही ऐसा रोग हो जिसकी राजधानी भारत न बने।

‘दो बाबा रामदेव ले आना’। यह आवाज जब मेरे कानो मे पडी तो मै कुछ समझ नही पाया। ध्यान से सुना तो एक ढाबे का मालिक लडके को शीतल पेय लाने कह रहा था। यह तो बाबा का सीधा मजाक था। यह हमारा देश है जहाँ कोई आम लोगो को बताये कि अमुक उत्पाद से ये नुकसान हो सकते है तो लोग उसे त्यागने और बताने वाले को धन्यवाद देने की बजाय उल्टे उसका मजाक उडाते रहते है। शीतल पेयो से क्या नुकसान है? हम सब जानते है। फिर भी पता नही किस मजबूरी मे रोज इसे पीये जा रहे है।

अमेरिका की एक भारतीय मूल की गृहणी ने मुझे लिखा कि मेरा बच्चा नाना प्रकार के रोगो से ग्रस्त है आप कुछ ऐसी वनस्पतियाँ बताये जिससे वह इन्हे दिनचर्या मे शामिल कर स्वास्थ्य हो जाये। मैने उनसे कहा कि आप दिन भर बच्चा क्या-क्या खाता है, इसका विस्तार भेज दे। मैने जब उनका जवाब पढा तो पता चला कि दिन मे कई बार बच्चा शीतल पेय और आलू के चिप्स खाता है। अक्सर भोजन की जगह इन दोनो से काम चला लेता है। मै अवाक रह गया। उन्होने लिखा कि ये दोनो बच्चे के लिये बहुत जरुरी है। मैने उनसे कन्नी काटना ही उचित समझा। मै सत्तू और भूने चने की बात कर भी देता तो कौन सा बच्चा खाने ही लग जाता। वे कहती कि इस पर मार्डन रिसर्च दिखाइये तभी मै बच्चे को दूंगी।

शीतल पेयो से नुकसान का राग हम अक्सर अलापते है। विज्ञान भी हमारा समर्थन करता है पर आज का विज्ञान डराता ज्यादा है, समाधान कम बताता है। शीतल पेय़ नुकसानदायक है तो इसके विकल्प तैयार होने चाहिये। फिर विज्ञान को इसे आम लोगो मे प्रचारित करना चाहिये। सिर्फ समस्या को बताने से काम नही चलने वाला।

च्यूंगम के बारे मे इंटरनेट खंगालते समय मैने पाया कि भारत मे बिक रही बहुत सी च्यूंगम मे फ्लोराइड है। आधुनिक शोध परिणाम बताते है कि यह फ्लोराइड दाँतो के लिये अच्छा है। पर इसकी मात्रा अधिक होने पर यह दाँतो के लिये अभिशाप भी बन सकता है। च्यूंगम हर उम्र के लोग खाते है। क्या सभी पर फ्लोराइड का एक जैसा ही असर होगा? क्या सभी को यह लाभ ही करेगा? ऐसे अनगिनत प्रश्न तो है पर जवाब देने वाला कोई नही है।

मनुष्य की तो कीमत नही रह गयी है अब। चलिये यह उम्मीद करे कि विज्ञापन वाली भैस को च्यूंगम के दुष्प्रभाव से बचाने कोई पशुप्रेमी सामने आयेगा।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित


--- तो इसलिये नष्ट किया जा रहा है रतनजोत (जैट्रोफा) भारतीय किसानो द्वारा
- पंकज अवधिया 
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जब भी मै अपने शहर रायपुर से बाहर निकलता हूँ वानस्पतिक सर्वेक्षण के लिये तो हर दिशा मे रतनजोत (जैट्रोफा) के पौधे दिख जाते है। रतनजोत के दिखने का क्रम दिन भर जारी रहता है चाहे वह मैदानी इलाका हो या पहाडी। उजाड हो या घना जंगल। ‘अति सर्वत्र वर्जयेते’ को समझते हुये मै इस विदेशी पौधे के व्यापक रोपण का विश्व स्तर पर विरोध कर रहा हूँ। केवल विरोध करना है इसलिये विरोध नही कर रहा हूँ। कैसे इतने बडे पैमाने पर किसी एक वनस्पति का रोपण किसी भी देश की जैव-विविधता के लिये अभिशाप बन जाता है इसे वैज्ञानिक तथ्यो के साथ प्रस्तुत करना जरुरी होता है। जब किसी लेख या व्याख्यान मे मै कहता हूँ कि रतनजोत मे कीडे लग रहे है या इससे जैव-विविधता खतरे मे है तो लोग प्रश्नो की झडी लगा देते है। ऐसे मे रतनजोत पर लगातार नजर रखने और उसके चित्र लेने का काम बहुत मदद करता है। रतनजोत पर लगातार नजर रखने के कारण अक्सर अन्य काम पीछे रह जाते है और मै दिन भर इस विषय मे जानकारी एकत्र ही करता रह जाता हूँ।

कुछ दिनो पहले राजधानी के पास बडी तादाद मे उखाडे गये रतनजोत को देखकर मैने गाडी रुकवायी। रतनजोत को इस हालत मे मैने कभी नही देखा था। मेरे चालक ने कहा कि हो सकता है कि जलाउ लकडी के रुप मे इसका उपयोग होने लगा हो और इसलिये लोग इसे काटकर सुखा रहे हो। पर रतनजोत मे लेटेक्स होने के कारण यह अधिक उपयोगी जलाउ लकडी नही है। मैने तस्वीरे ली और आस-पास के लोगो से पूछा पर शायद सरकारी साहब समझ पर वे सहम से गये। कुछ आगे बढे तो रतनजोत के पौधो के ऐसे ढेर दिखे जिन्हे जलाया जा रहा था। लोगो ने बताया कि हम किसान है। सरकारी विभागो ने खेत की मेडो पर इसे लगा दिया था। खाद पानी मिलने से इन्होने राक्षसी रुप धारण कर लिया। फिर ये खेतो मे घुसने लगे। खेतो मे तो परम्परगत फसले होती है और रतनजोत क्या, किसी भी घुसपैठिये को अन्दर आने की अनुमति नही देते है किसान। सो उन्होने अन्य खरपतवारो की तरह इसे भी उखाडा और जला दिया। मेरे कहने से पहले ही वे बोले कि यदि इसी रफ्तार से इन्हे रोपा जाता रहा तो ये अधिक ताकत से अपने बीज फैलायेंगे और खेतो मे किसानो के लिये नया सिरदर्द बनेंगे।

मलेशिया मे कैब इंटरनेशनल नामक वैज्ञानिक संस्थान मे शोधरत वरिष्ठ वैज्ञानिक डाक्टर सास्त्रोटुमो ने पिछले दिनो मुझे सन्देश भेजकर बताया कि वे दुनिया भर मे रतनजोत के व्यापक रोपण से होने वाले नुकसानो को एकत्र कर एक वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार कर रहे है। मेरे शोध आलेखो को देखकर उन्होने लिखा कि भारत जो कि जैव-विविधता मे धनी है वहाँ एक ही तरह के विदेशी पौधे के व्यापक रोपण से जो नुकसान हो रहे है उस पर मै लिखूँ। मैने उन्हे अपना शोध उपलब्ध कराया। उन्होने बताया कि दुनिया भर के वैज्ञानिक सामने आकर दस्तावेज उपलब्ध करवा रहे है और रतनजोत के विषय मे नग्न सत्य सामने आ रहे है। बहुत से देशो मे इसने अब अपने आप फैलना आरम्भ कर दिया है। भारत सहित उन देशो मे जहाँ इसे जंगलो मे रोपा गया, इस फैलाव से देशी वनस्पतियो को खतरा उत्पन्न हो गया है।

रतनजोत पर बडी संख्या मे कीडो का आक्रमण हो रहा है। सबसे निराश करने वाली बात यह है कि इनमे से ज्यादातर कीडे वे है जो कि परम्परागत फसलो पर भी आक्रमण करते है। आमतौर पर किसान मेडो और खेत के आस-पास उग रहे खरपतवारो को उखाडकर नष्ट कर देते है। इसके बहुत से कारण है। एक बडा कारण इन खरपतवारो द्वारा फसल पर आक्रमण करने वाले कीटो और रोगो को शरण देना है। अब जब हर गाँव के पास रतनजोत का व्यापक रोपण होने और फसलो पर आक्रमण करने वाले कीटो और रोगो के रतनजोत पर भी आक्रमण करने से अजीब समस्या पैदा हो गयी है। जब फसल का समय होता है तो ये कीट फसलो पर आश्रित रहते है। फिर फसल कटने के बाद ये रतनजोत पर मजे करते है। अगली फसल के समय फिर खेतो मे आ जाते है। अब किसान दुविधा मे है कि वे परम्परागत फसल चुने या रतनजोत को। फसलो को बचाने के लिये रतनजोत को नष्ट करना आने वाले दिनो मे अंतिम विकल्प बन जायेगा।

अभी तक छत्तीसगढ ही मे 50 से अधिक किस्म के कीटॉ का पता लग चुका है जो कि रतनजोत को निशाना बनाते है। मैने इनके चित्र इंटरनेट पर उपलब्ध करवाये है पर आज भी दुनिया भर मे ऐसे प्रायोजित समाचारो का प्रकाशन जारी है कि रतनजोत मे कीटो और रोगो का आक्रमण नही होता है।

छत्तीसगढ मे रतनजोत का विरोध सरकार विरोधी लग सकता है। पर अब तो पूरे देश मे क्या पूरी दुनिया मे इसे लगाया जा रहा है। यह अलग बात है कि छत्तीसगढ को आदर्श के रुप मे प्रस्तुत किया जा रहा है। तंग विचारो के लोग इसे सरकार विरोधी काम कह सकते है पर सरकार तो पाँच सालो के लिये है। चलिये यह मान ले कि बीस सालो तक है पर रतनजोत का यह व्यापक रोपण यदि एक बडी भूल साबित हुआ तो इस अभिशाप को पीढीयो तक झेलना होगा जैसा कि हम यूकिलिप्टसबेशरमलेंटाना और जल कुम्भी आदि के रुप मे झेल रहे है।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

© सर्वाधिकार सुरक्षित


आखिर कब तक होती रहेगी भारतीय सम्पदा की चोरी इस तरह?
- पंकज अवधिया 
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कल ही मुझे एक भारतीय वैज्ञानिक का सन्देश मिला जिसमे संकट मे पडे दो विदेशी वैज्ञानिको को बचाने आन-लाइन याचिका पर हस्ताक्षर करने की अपील की गयी थी। इस सन्देश मे कहा गया था दोनो विदेशी वैज्ञानिको ने भारतीय कानून तोडा है पर चूँकि उनका विश्व मे बहुत नाम है इसलिये उन्हे छोड दिया जाना चाहिये। मैने इंटरनेट पर खोजा तो घटना की जानकारी मिली। घटना दार्जिलिंग के पास की है जहाँ इसी साल जून के अंतिम सप्ताह मे चेक गणराज्य के दो नागरिक राष्ट्रीय वन्यप्राणी अभ्यारण्य मे बिना अनुमति के सैकडो कीडो के साथ पकडाये। वन विभाग ने वन्यप्राणी सुरक्षा अधिनियम के तहत उन पर कार्यवाही की और न्यायालय ने उन्हे जमानत देने से इंकार कर दिया। अब अगले सप्ताह इसकी सुनवाई होगी। यह भी जानकारी मिली कि इनके पास टाइगर बीटल नामक विशेष आर्थिक महत्व के कीट पाये गये जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार विशेषकर चीन मे बहुत माँग है। एक कीट की कीमत हजारो मे है। जिस भारतीय वैज्ञानिक ने अपील भेजी थी उसका तर्क था कि इन लोगो ने अपने म्यूजियम के लिये इसे एकत्र किया होगा। इतने बडे वैज्ञानिक व्यापार के लिये ऐसा नही कर सकते।

देश मे राजनीति से सम्बन्धित इतनी खबरे सामने आती है कि ऐसी महत्वपूर्ण खबरे हाशिये मे चली जाती है। इस समाचार को पढते ही सबसे पहले मन हुआ कि उन अधिकारियो की पीठ थपथपाऊँ जिन्होने इस अहम चोरी को पकडा। क्यो न उन्हे राष्ट्रीय हीरो माना जाये? आखिर जिस जैव-विविधता के नाम पर हम इतना खर्च करते है, बडे-बडे व्याख्यान देते है उसकी रक्षा इन अधिकारियो ने की है।

यह एक बडा प्रश्न है कि बिना अनुमति ये वैज्ञानिक कैसे ये कार्य कर रहे थे? राष्ट्रीय जैव विविधता बोर्ड की अनुमति के बिना भारत मे कानूनी रुप से किसी विदेशी को इस तरह के कार्यो की अनुमति नही है। रंगे हाथो पकडे जाने पर सजा का कडा प्रावधान है भले ही पकडे जाने वाले कितने ही जाने-माने वैज्ञानिक क्यो न हो? इस समाचार के आगे की कडी तो नही मिली पर निज सम्पर्को से पता चला कि बोर्ड तक शायद ही इसकी शिकायत पहुँचे। बाहरी दबाव मे जुर्माने मे सब निपट जाये। यदि ऐसा हुआ तो भारतीय सम्पदा की चोरी मे लिप्त लोगो के हौसले बढेंगे। वे अगली बार सुरक्षात्मक तरीके से यह कार्य करेंगे ताकि कोई कानूनी समस्या न हो।

कुछ दिनो पहले रायपुर के विमानतल पर सुरक्षा जाँच करते जवान से मैने पूछा कि क्या कभी कोई दुर्लभ वनस्पति या कीडे पकडाये है यात्रियो के पास से तो वह बगले झाँकने लगा। फिर बोला कि कई बार पिस्तौल पकडायी है। मैने यही सवाल हैदराबाद मे भी किया तो सुरक्षा अधिकारियो ने कहा कि आम लोग देश के दूसरे हिस्सो और विदेशो मे दवा के नाम पर वनस्पतियाँ ले जाते है। अब हमे ही जानकारी नही है कि कौन सी वनस्पति को देश से बाहर ले जाने से रोकना है और किसे साथ ले जाने देना है तो हम जान कर भी कैसे कार्यवाही करे? शायद उनके उच्च अधिकारियो को इसकी जानकारी हो पर वनस्पतियो की पहचान कर पाना विशेषकर सूखी, तुडी-मुडी वनस्पतियो और बीजो की पहचान टेडी खीर है। बडे-बडे विशेषज्ञ चकमा खा जाते है तो आम लोगो की क्या बिसात।

मै अपने लेखो मे समय-समय पर यह जरुर लिखता हूँ कि केवल हल्दी और नीम के पेटेंट का रोना रोने की बजाय हमे ऐसे सशक्त उपाय करने चाहिये जिससे देश की सम्पदा की चोरी न हो। विदेशी अतिथियो और उन्हे खुश करने मे लगे आस्तीन के साँपो की पहचान और उन पर अंकुश जरुरी है। यदि आप बारनवापारा या कान्हा किसी भी अभ्यारण्य के गाइडो से पूछेंगे तो वे बता देंगे कि कैसे विदेशी भारतीय सम्पदा पर नजर गडाये रहते है। कैसे वे दुर्लभ वनस्पतियो और उनके उपयोगो के बारे मे सब कुछ जान ले ना चाहते है? बताने वालो को तो इस ज्ञान की कीमत नही मालूम है और फिर उन्हे यह किसी ने नही बताया है कि इस तरह की जानकारी एकत्र करने मे मदद करना कानूनन जुर्म है। कुछ महिनो पहले मै छत्तीसगढ के मैकल पर्वत पर गाजर घास के बढते फैलाव का अध्ययन कर रहा था। सडक के किनारे गाजर घास का दिख जाना तो आम है पर घने जंगलो के अन्दर जाती पगडंडियो मे इसे दूर तक उगते देखकर मैने स्थानीय लोगो से कारण पूछा। वे बोले कि विदेशी पर्यटक इन रास्तो से जाते है और उनके सामानो के साथ गाजर घास के बीज भी अन्दर तक चले जाते है। मैने और विस्तार से जानने की कोशिश की तो पता चला कि आस-पास कई रिसोर्ट है जिन्होने वनस्पति विज्ञानियो को नौकरी पर रखा है। ये विशेषज्ञ विदेशी पर्यटको के लिये रखे गये है। आप ही समझ सकते है कि अब तक कितना पानी बह चुका होगा।

जंगल की रक्षा मे लगे छोटे कर्मचारियो से लेकर देश से बाहर जाने वाले रास्तो पर तैनात अधिकारियो को नये सिरे से इस विषय मे जमीनी स्तर की जानकारी देनी आवश्यक है। विशेषज्ञो की टीम भी तैयार करनी होगी जो कि बिना विलम्ब आवश्यकत्ता पडने पर इन अधिकारियो द्वारा पकडी गयी वनस्पतियो की पहचान कर सके। यह बडे दुख की बात है कि विशेषज्ञ हमारे देश मे कम हो रहे है। यह नीरस विषय माना जाता है और आई टी क्षेत्र जैसे इसमे आकर्षक वेतन आदि नही है इसलिये युवा इस ओर रुख ही नही कर रहे है। विभाग छात्रो की बाट जोह रहे है। जो भूले-भटके आ जाते है वे मौका मिलते ही विदेशो का रुख कर लेते है। हमारे वरिष्ठ विशेषज्ञ पुरानी किताबो को ही दुनिया मान बैठे है। यदि उसमे जानकारी नही मिली तो वे हथियार डाल देते है। ऐसे मे कैसे संपदा को हम बचा पायेंगे यह प्रश्न यक्ष प्रश्न की तरह सामने है।

भारतीय वैज्ञानिक द्वारा साफ तौर पर दोषी विदेशी वैज्ञानिको बचाने की अपील निज स्वार्थ के लिये तो ठीक है पर राष्ट्रहित मे नही है-ऐसा मेरा मानना है। हाशिये मे पडे इस समाचार को आम लोगो के सामने लाना और फिर इस पर व्यापक बहस की मंशा से मैने यह लेख लिखा है।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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किसानो और पारम्परिक चिकित्सको के गठबन्धन मे ही निहित है औषधीय और सगन्ध फसलो का सुनहरा भविष्य़
- पंकज अवधिया
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छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको के बीच मधुमेह की चिकित्सा के लिये एक जटिल औषधीय मिश्रण लोकप्रिय है। इसमे 45 प्रकार की वनस्पतियो का प्रयोग किया जाता है। वर्तमान मे 125 से अधिक पारम्परिक चिकित्सक इसका उपयोग दैनिक जीवन मे कर रहे है। इन्हे पूरे देश मे जाना जाता है इसलिये देश के कोने-कोने यहाँ तक कि विदेशो से भी मधुमेह के रोगी चिकित्सा के लिये आते है। मिश्रण का निर्माण वे स्वयम करते है। उपयोग की जाने वाली वनस्पतियाँ पहले जंगलो से मिल जाती थी। पर अब रोज-रोज इन्हे एकत्र करने से उन्हे जंगलो मे काफी दूर तक जाना पडता है। इससे उनके कार्य मे व्यवधान आता है। कई बार मिश्रण के अभाव मे रोगियो को खाली हाथ लौटना पडता है। पारम्परिक चिकित्सक जानते है कि आने वाले दिनो मे रोगियो की बढती संख्या को देखते हुये यह समस्या और बढेगी। वानस्पतिक सर्वेक्षणो के दौरान कई बार उन्होने मेरे सामने यह समस्या रखी। उन्होने उपयोग की जाने वाली वनस्पतियो का ब्यौरा उपलब्ध करवाया। मैने पाया कि इनमे से ज्यादातर वनस्पतियाँ खेतो मे उगायी जा सकती है।

जैसा कि आप जानते है कि ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सक औषधीय वनस्पतियो की खेती के लिये तैयार नही होते है। उनका मानना है कि खेती से उत्पादित वनस्पतियो के औषधीय गुणो मे कमी आ जाती है। उनका यह मानना गलत नही है क्योकि आधुनिक वैज्ञानिक अनुसन्धानो से भी अब यह बात सिद्ध हो चुकी है। फिर भी वनस्पतियो के अभाव को देखते हुये उन्होने अनुरोध किया कि वे खेती से तैयार वनस्पतियो को जाँचना चाहेंगे। लघु पैमाने पर उत्साही किसानो की मदद से इन वनस्पतियो को जैविक विधियो से उत्पादित किया गया। जंगलो से मिट्टी लायी गयी और वनस्पतियो को तनाव मे रखने की कोशिश की गयी। पारम्परिक चिकित्सको ने अपने ढंग़ से इन्हे खेतो से एकत्र किया और फिर अपने रोगियो पर आजमाया। उन्हे वनस्पतियो का प्रभाव दिखा पर उतना नही जितना कि जंगल से प्राप्त वनस्पतियो मे होता है। फिर भी उन्होने हरी झंडी दिखायी कि यदि किसान इसे उगाकर दे तो हम इसे खरीदेंगे और पूरी कीमत देंगे।

पारम्परिक चिकित्सको ने किसानो के सामने शर्त रखी कि वे किसी भी परिस्थिति मे उत्पादन बढाने के लिये रासायनिक आदानो का प्रयोग नही करेंगे। हमेशा जैविक विधियो का प्रयोग करेंगे। किसानो ने भी आश्वासन चाहा कि उन्हे यह खेती पारम्परिक फसलो से अधिक लाभदायक सिद्ध होनी चाहिये। मुझे यह गठबन्धन बडा ही उपयोगी लग रहा है। भले ही यह बहुत छोटे स्तर पर हो रहा है पर भारत जैसे देश मे जहाँ लाखो कारगर नुस्खे है और हजारो पारम्परिक चिकित्सक अपनी सेवाए दे रहे है यदि वे एकजुट हो जाये तो इस छोटे प्रयोग को बडे रुप मे किया जा सकता है और सफलता सुनिश्चित की जा सकती है। मै पिछले डेढ दशक से भी अधिक समय से पारम्परिक मिश्रणो का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अब तक केवल छत्तीसगढ मे ही खरपतवार समझे जाने वाले चरोटा (कैसिया टोरा) नामक वनस्पति पर आधारित 25,000 से अधिक मिश्रणो का दस्तावेजीकरण किया जा चुका है। आप कल्पना भी नही कर सकते कि पूरे देश के ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया जाये तो पता नही कितने सारे नये नुस्खे मिले। चरोटा पर आधारित इतने नुस्खे तो प्राचीन गंथो मे भी नही है।

देश मे औषधीय और सगन्ध फसलो की खेती मे लगे किसानो ने प्रयोगो के दौर मे मार्केटिंग के चक्कर मे बहुत हानि उठायी है। फसलो के उत्पादन मे तो हमारे किसान दक्ष हो गये पर उतपादो को बेच पाना उनके लिये सिरदर्द बन गया। बात होती रही विदेशी माँग की पर दूर-दराज मे बैठे किसान क्रेताओ के पास पहुँच न सके। इससे सारा गणित बिगड गया और उनमे असंतोष जागा। किसान साल भर मेहनत करे और फिर उत्पाद बेचने के लिये महानगरो के चक्कर लगाये, यह जमीनी स्तर पर सम्भव नही लगता है। गाँव मे ही या आस-पास के कस्बो मे यदि सुनिश्चिय मार्केट हो तो भला कौन सा किसान इस सुअवसर का लाभ नही उठाना चाहेगा।

पारम्परिक चिकित्सको पर अब भी हमारे देश का कानून अंकुश लगाये हुये है पर जिस तरह से दुष्प्रभावयुक्त आधुनिक चिकित्सा प्रणालियो से आम आदमी का मोह भंग हो रहा है उससे लगता है कि पारम्परिक चिकित्सा की ओर जनमानस लौटेगा और पारम्परिक चिकित्सको के महत्व को फिर से समझा जायेगा। इस प्रादर्श मे पारम्परिक चिकित्सको और किसानो दोनो ही को प्रोत्साहित करने की जरुरत है। इसमे यदि आज के पढे-लिखे किताबी ज्ञान वाले योजनाकार और निज स्वार्थ मे डूबे उद्योगपति दखलान्दाजी करेंगे तो किसानो और पारम्परिक चिकित्सको के हाथो से बाजी निकलते जरा भी देर नही लगेगी।


(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे है।)

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क्या आप करेंगे औषधीय फसलो की माँग-आधारित विशेष खेती?
- पंकज अवधिया
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कुछ समय पूर्व मुझे एक सन्देश मिला जिसमे कहा गया था कि औषधी निर्माण के लिये बडे पैमाने पर कलिहारी नामक औषधीय वनस्पति की आवश्यकत्ता है। क्या आप मदद कर सकते है? मैने अपनी सहमति जता दी। यह सन्देश एक बडी दवा निर्मात्री कम्पनी का था जो कि अपने प्रक्षेत्र मे इस वनस्पति की खेती करके दवा का निर्माण करना चाहती थी। उन्होने मेरे शोध आलेखो के आधार पर देश के मध्य भाग मे कलिहारी की खोज की तो विशेषज्ञो ने साफ कह दिया कि कलिहारी के प्राकृतिक स्त्रोत के लिये आप दक्षिण भारत का रुख करे क्योकि हमारे जंगलो मे यह नही है। उन्हे बडा आश्चर्य हुआ। यह बात सही है कि दक्षिण भारत से बडी मात्रा मे कलिहारी की आपूर्ति पूरी दुनिया को होती है पर इसका मतलब यह कतई नही कि देश के दूसरे भागो मे यह नही पायी जाती है।

छत्तीसगढ के जंगलो मे यह प्राकृतिक रुप से उपस्थित है। कभी व्यापारियो की इस पर नजर नही पडी इसलिये यह मजे से उग रही है। उस दवा कम्पनी ने मुझसे सीधे सम्पर्क करने का मन बनाया। उन्होने किसानो की एक छोटी सी टोली से मिलवाने को कहा जो कुछ सालो तक उनके लिये कलिहारी की खेती करे। किसान मिल गये और सुनिश्चित बाजार का अश्वासन मिलने पर तैयार भी हो गये। यूँ तो आधुनिक शोध ग्रंथो से लेकर सामान्य अखबारो मे कलिहारी की व्यवसायिक खेती पर आपको ढेरो लेख मिल जायेंगे पर जमीनी स्तर पर ऐसे लेखो की उपयोगिता कितनी होती है-यह हम सभी जानते है। कम्पनी को उच्च गुणवत्ता की फसल चाहिये थी इसलिये मैने अपने प्रयोगो के अलावा उन पारम्परिक चिकित्सको की मदद लेना भी उचित समझा जो कि पीढीयो से उच्च गुणवत्ता की कलिहारी की पहचान जंगलो मे कर रहे है और बतौर औषधी इसके प्रयोग से अपने रोगियो की जान बचा रहे है। उन्होने जंगल जाकर कलिहारी को प्राकृतिक आवास मे देखने की सलाह दी। किसान तैयार हो गये। जब उन्होने कलिहारी को माँ प्रकृति की प्रयोगशाला मे उगते देखा तो वे बडे प्रसन्न हुये।


अमूमन किसानो को नासमझ मान लिया जाता है। ज्यादातर विषय विशेषज्ञ कहे जाने वाले लोग ऐसी भूल कर बैठते है। किसानो ने सबसे पहले मिट्टी का अध्ययन किया फिर पौधो को खोद कर देखा। पारम्परिक चिकित्सको ने उन्हे आस-पास उग रही वनस्पतियो से परिचित करवाया और कहा कि ये वनस्पतियाँ हानिकारक रोगो और कीटो से कलिहारी की रक्षा करती है और कलिहारी की भी यही भूमिका होती है। कलिहारी की खेती मे जब इनकी समस्या आयेगी तो इन वनस्पतियो का सत्व ही रसायनो के प्रयोग के बिना फसल को बचाये रखने मे सहायक होगा। ऐसा हुआ भी। किसानो को कलिहारी की व्यवसायिक खेती मे मदद मिली और उन्होने उच्च गुणवत्ता की ऐसी फसल तैयार की जैसे कि वे पीढीयो से इसकी खेती कर रहे हो। पूर्व निर्धारित दाम देकर कम्पनी वापस चली गयी।

आज के वैश्वीकरण के युग मे मै किसानो की तुलना उस रसोइये से करता हूँ जिसे कैसा भी आर्डर देने पर वह इंकार नही करता और मनचाहा व्यंजन परोस देता है। हम कितना भी किताबी ज्ञान ले ले पर दाल मखानी के लिये हमे रसोइये की ही मदद लेनी होगी। ठीक उसी तरह दवा निर्मात्री कम्पनियो को ऐसे किसानो की सतत तलाश होती है जो कि विश्व माँग या उनकी अपनी माँग के आधार पर वनस्पति विशेष की खेती करके वांछित उत्पाद मुहैया करवा दे। आजकल ऐसी कम्पनियो की संख्या बढ रही है। कम्पनियो और किसानो दोनो ही तरफ से विश्वसनियता की समस्या होती है। ऊपर वर्णित समझौते मे दोनो के बीच सेतु के रुप मे मैने भूमिका निभायी। कम्पनी ने तकनीकी मार्गदर्शन के लिये मुझे मानदेय दिया और किसान मेरे भरोसे पर रहे। पर हर जगह यह सम्भव नही हो पाता है।

कम्पनी को यह डर सता रहा होता है कि यदि इसका प्रचार प्रसार हुआ तो उनके प्रतिस्पर्धी भी यह करने लगेंगे और मुनाफा कम हो जायेगा। हाल ही हडजोड की व्यवसायिक खेती के लिये दक्षिण की एक कम्पनी ने मुझसे सम्पर्क किया। किसानो तक यह बात पहुँची तो सारे एहतियात के बाद भी इसका प्रचार हो गया। अखबारो मे खबर आ गयी कि हडजोड की खेती मे मुनाफा है और किसान इसे उगाकर अमुक कम्पनी को बेच सकते है। खबर पुणे की कम्पनी तक भी पहुँची और दूसरे ही दिन वे भी पहुँच गये। तीन-चार और लोग आ गये। इस प्रतिस्पर्धा से किसानो को अधिक मूल्य मिलने की बजाय आपस मे ही खीचतान होने लगी। मैने इस पचडे से हटना ही उचित समझा। बाद मे पता चला कि केवल एक कम्पनी ने खेती की पर उत्पाद लेने से मना कर दिया। किसानो ने लिखित समझौता नही किया था।

यही कारण है कि कम्पनियाँ गोपनीयता की उम्मीद करती है। मैने अपने अनुभव से पाया है कि एक बार अच्छे सम्बन्ध हो जाने पर वर्षो तक यह जारी रहता है। कलिहारी के किसानो ने कम्पनी से अनुबन्ध के बाद फिर पारम्परिक फसलो की राह पकडी और अब वे तैयार है अगले प्रस्ताव के लिये। उनके द्वारा कलिहारी की खेती समाप्त करने के बाद आस-पास के किसानो ने देखा-देखी मे इसे उग़ाना शुरु किया पर मार्केट के अभाव मे घाटे मे ही रहे।

अन्न की तरह अधिक मात्रा मे औषधीय उत्पादो की आवश्यकत्ता नही होती है। यही कारण है कि बडे पैमाने पर एक ही तरह की औषधीय फसलो की खेती करने के बाद किसान इन्हे बेच पाने मे असफल रहे। माँग के अनुसार विशेष खेती को अपनाकर बहुत से देशो मे किसान अभी भी किसानी को अधिक आमदनी का जरिया बनाये हुये है। हम तो भाग्यशाली है जो भारत जैसे जैव-विविधता पूर्ण देश मे पैदा हुये है। आने वाले दिनो मे इस तरह की विशेष खेती विशेषकर भारतीय वनस्पतियो की विशेष खेती का प्रचलन बढेगा। इस सुअवसर का लाभ उठाने के लिये हमे अभी से मानसिक रुप से तैयार रहना होगा।

(लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे है।)

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